कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context३१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) वित्तापहारिणो वा दासस्यार्यभावमपहरतोऽर्धदण्डः । निष्पतित-प्रेतव्यसनिनामाधाता मूल्यं भजेत । (२) प्रेतविण्मूत्रोच्छिष्टग्राहणमाहितस्य नग्नस्नापनं दण्डप्रेषणमति-क्रमणं च स्त्रीणां मूल्यनाशकरम् । धात्रीपरिचारिकार्धसीतिकोपचारिकाणां च मोक्षकरम् । सिद्धमुपचारकस्याभिप्रजातस्य अपक्रमणम् । (३) धात्रीमाहितिकां वाकामां स्ववशामधिगच्छतः पूर्वः साहस दण्डः, परवशां मध्यमः । कन्यामाहितिकां वा स्वयमन्येन वा दूषयतः मूल्यनाशः शुल्कं तद्विगुणश्च दण्डः । (४) आत्मविक्रयिणः प्रजामार्यां विद्यात् । आत्माधिगतं स्वामिकर्मा-विरुद्धं लभेत, पित्र्यं च दायम् । मूल्येन चार्यत्वं गच्छेत् । तेनोदरदासाहित-कौ व्याख्यातौ ।
बनाकर रखा जाय । ये दोनों दास यदि किसी दूसरे देश में चले जाने का इरादा करें तब भी उन्हें जीवन पर्यन्त के लिए दास बनाया जाय ।
(१) धन का अपहरण करने वाले तथा किसी आर्य को दास बनाने वाले व्यक्ति को आधा दण्ड दिया जाय । गिरवी रखे हुए व्यक्ति यदि भाग जायँ, मर जांय या बीमार हो जांय तो गिरवी रखने वाला ही उनका मूल्य दे ।
(२) जो स्वामी अपने पुरुष गुलामों से मुर्दा, मल-मूत्र या जूठन उठवावे, और महिला गुलामों को अनुचित दण्ड दे, उनके सतीत्व को नष्ट करे, नग्नावस्था में उसके पास जाय या नङ्गा कराके उनको अपने पास बुलावे तो उसका धन जब्त कर लिया जाय । यदि यही व्यवहार दाई, परिचारिका, अर्द्धसीतिका (जिस जाति में पुरुषों का जीवन-निर्वाह स्त्रियों पर निर्भर रहता है) और भीतरी दासी (उपचारिका) आदि के साथ किया जाय तो उन्हें दासकार्य से मुक्त कराया जाय । यदि उच्चकुलोत्पन्न दास से उक्त कार्य कराये जायँ तो वह दास कर्म को छोड़कर जा सकता है ।
(३) अपनी दासी या गिरवी रखी हुई किसी स्त्री को उनकी इच्छा के विरुद्ध अपने वश में करने वाले व्यक्ति को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय किन्तु उनको यदि दूसरे व्यक्ति के वश में करने की कोशिश करे तो उसे मध्यम साहस दण्ड दिया जाय । गिरवी में आई कन्या को यदि कोई व्यक्ति स्वयं या किसी दूसरे के द्वारा दूषित करे तो उसका बदले में दिया धन जब्त कर लिया जाय, जुर्माने के तौर पर कुछ धन वह कन्या को दे और उससे दुगुना दण्ड सरकार को अदा करे ।
(४) अपने आपको बेच देने वाले आर्य पुरुष की सन्तान भी आर्य ही समझी जाय । वह अपने मालिक की आज्ञानुसार कमाये हुए धन को अपने पास रख सकता है और पिता की सम्पत्ति का भी उत्तराधिकारी हो सकता है । बाद में अपनी कीमत