कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context३१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रक्रान्ते तु कर्मणि स्वस्थस्यापक्रामतो द्वादशपणो दण्डः । न च प्राकाम्यमपक्रमणे । (२) चोरं त्वभयपूर्वं कर्मणः प्रत्यंशेन ग्राहयेद्, दद्यात्प्रत्यंशमभयं च । न पुनस्तेये प्रवासनमन्यत्र गमने च । महापराधे तु दूष्यवदाचरेत् । (३) याजकाः स्वप्रचारद्रव्यवजं यथासम्भाषितं वेतनं समं विभजेरन् । (४) अग्निष्टोमादिषु च ऋतुषु दीक्षणादूर्ध्वं याजकः सन्नः पंचममंशं लभेत । सोमविक्रयादूर्ध्वं चतुर्थमंशम् । मध्यमोपसदः प्रवर्त्योद्वासनादूर्ध्वं तृतीयमंशम् । माध्यादूर्ध्वमर्धमंशम् । सुत्ये प्रातस्सवनादूर्ध्वं पादोनमंशम् । माध्यन्दिनात् सवनादूर्ध्वं समग्रमंशं लभेत । नीता हि दक्षिणा भवन्ति । बृहस्पतिसवनवर्जं प्रतिसवनं हि दक्षिणा दीयन्ते । तेनाहर्गणदक्षिणा व्याख्याताः ।
( १ ) कार्य चालू रहते हुए यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति कार्य को छोड़कर चला जाय तो उसे बारह पण दण्ड दिया जाय; क्योंकि इस प्रकार काम छोड़कर चले जाना किसी की इच्छा पर निर्भर नहीं होता ।
( २ ) यदि कोई साझीदार चोरी कर ले तो उसको क्षमाकर उससे सच-सच बात बतला देने एवं उसका पूरा हिस्सा देने के लिए कहा जाय; और यदि वह सच-सच बतला दे तो उसको पूरा हिस्सा देकर माफ किया जाय । यदि वह फिर भी चोरी करे और यदि दूसरे देश में जाकर के चोरी करे तो उसे साझीदारी से अलग कर देना चाहिए, यदि वह कोई बड़ा अपराध करे तो उसके साथ राजकीय अपराधी जैसा व्यवहार किया जाय ।
( ३ ) याज्ञिकों का बँटवारा : यज्ञ करने वाले निजी उपयोग में आने वाली वस्तुओं को छोड़कर बाकी सारे वेतन को पूर्व निश्चय के अनुसार या बराबर-बराबर बाँट लें ।
( ४ ) अग्निष्टोम आदि यज्ञों में दीक्षा के बाद ही यदि अकस्मात् याजक बीमार पड़ जाय तो उसे पूर्व निश्चित सामग्री वेतन आदि का पाँचवाँ हिस्सा दिया जाय । यदि याजक सोम-विक्रय के बाद बीमार पड़े तो चौथा हिस्सा; मध्यमोपषद सम्बन्धी प्रवर्त्योद्वासन ( सोम तैयार करने सम्बन्धी क्रिया ) के बाद बीमार पड़े तो दूसरा हिस्सा; मध्यमोपषद के बाद बीमार पड़े तो आधा हिस्सा; सोम के अभिषव काल में प्रातःसवन के बाद बीमार पड़े तो तीन हिस्से; और माध्यन्दिन सवन के बाद बीमार पड़े तो सम्पूर्ण दक्षिणा ले ले, क्योंकि यज्ञ की समाप्ति पर दक्षिणा पूरी हो जाती है । बृहस्पति सवन को छोड़कर शेष सभी सवनों में दक्षिणा दी जाती है । इसी प्रकार अहर्गण आदि में दी जाने वाली दक्षिणाओं के सम्बन्ध में भी समझना चाहिये ।