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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्र० ७२ : अ० १४ ] मजदूरी के नियम ३१९

(१) सन्नानामा दशाहोरात्राच्छेदभृताः कर्म कुर्युः । अन्ये वा स्वप्रत्ययाः । (२) कर्मण्यसमाप्ते तु यजमानः सीदेत्, ऋत्विजः कर्म समापय्य दक्षिणां हरेयुः । (३) असमाप्ते तु कर्मणि याज्यं याजकं वा त्यजतः पूर्वः साहसदण्डः । (४) अनाहिताग्निः शतगुरयज्वा च सहस्रगुः । सुरापो वृषलीभर्ता ब्रह्महा गुरुतल्पगः ॥ असत्प्रतिग्रहे युक्तः स्तेनः कुत्सितयाजकः । अदोषस्त्यक्तुमन्योन्यं कर्मसंकरनिश्चयात् ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे कर्मकरविधिः सम्भूयसमुत्थानं नाम चतुर्दशोऽध्यायः, आदितः सप्ततितमः ।

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( १ ) बीमार हुए याजकों की जगह दक्षिणा लेकर कार्य करने वाले याजक दस दिन तक इस कार्य को पूरा करें अथवा दूसरे याजक अपनी स्वतंत्र दक्षिणा लेकर उस अधूरे कार्य को पूरा करें ।

( २ ) यज्ञ कार्य समाप्त होने से पहिले ही यदि यजमान बीमार पड़ जाय तो ऋत्विजों को चाहिए कि वे यज्ञ पूरा होने के बाद ही दक्षिणा लें ।

( ३ ) यज्ञ की समाप्ति के पूर्व ही यजमान यदि याजक को छोड़ दे अथवा याजक ही यजमान को छोड़ दें तो छोड़ने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) सौ गायों को रखते हुए भी अग्न्याधान न करने वाला, हजार गायों को रखते हुए भी यजन न करने वाला, शराबी, शूद्रा को घर में रखने वाला, ब्राह्मण को मारने वाला, गुरुपत्नी के साथ व्यभिचार करने वाला, कुत्सित दान लेने वाला, चोरों तथा कुकर्मियों के यहाँ यज्ञ करने वाला; याजक अथवा यजमान, यज्ञकर्म की पवित्रता बनाये रखने के लिए, यज्ञ समाप्ति के पूर्व ही, एक दूसरे को छोड़ सकता है ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में कर्मकरविधि नामक चौदहवां अध्याय समाप्त ।

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