कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ७२-७३ : अ० १६ ] दान और विक्रय सम्बन्धी नियम ३२७
(१) विवादपदेषु चैषां यावन्तः पणा दण्डाः तावती रात्रीः क्षपणा-भिषेकाग्निकार्यमहाकृच्छ्रवर्धनानि राज्ञश्चरेयुः । अहिरण्यसुवर्णाः पाषण्डाः साधवः । ते यथास्वमुपवासव्रतै राराधयेयुः । अन्यत्र पारुष्यस्तेयसाहससंग्रहणेभ्यः । तेषु यथोक्ता दण्डाः कार्याः ।
(२) प्रव्रज्यासु वृथाचारान् राजा दण्डेन वारयेत् । धर्मो ह्यधर्मोपहतः शास्तारं हन्त्युपेक्षितः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दत्तस्यानपाकर्म-अस्वामिविक्रय-स्वस्वामिसम्बन्धो नाम षोडशोऽध्यायः; आदितो द्विसप्ततितमः ।
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(१) इन लोगों में परस्पर झगड़ा हो जाने के कारण अपराधी को जितना पण दण्ड किया जाय, उतनी ही रात्रि वह राजा के कल्याण के लिए उपवास, स्नान, अग्निहोत्र और कठिन चांद्रायण व्रतों का अनुष्ठान करे । हिरण्य-सुवर्ण आदि रखने वाले धर्मशील पाखंडी भी दण्डित होने पर राजा की कल्याण-कामना के लिए यथोचित व्रत-आदि करें । यदि वे मार-पीट, चोरी, डाका और व्यभिचार करें तो उन्हें सहज ही में न छोड़ा जाय बल्कि अपराध के अनुसार उनको पूर्वोक्त सभी प्रकार के दण्ड दिये जायें ।
(२) संन्यासियों के बीच होने वाले मिथ्या आचार-विचारों को राजा दण्ड के द्वारा ही दूर करे क्योंकि अधर्म से दबाया और उपेक्षा किया हुआ धर्म शासन करने वाले राजा को नष्ट कर देता है ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दानविक्रय सम्बन्ध नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ।
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