कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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(१) स्त्रियं पुरुषं वाभिषह्य बध्नतो बन्धयतो बन्धं वा मोक्षयतः पंच- शतावरः सहस्रपर उत्तमः साहसदण्ड इत्याचार्याः।
(२) यः साहसं प्रतिपत्तेति कारयति स द्विगुणं दद्यात् । यावद्धिरण्य- मुपयोक्ष्यते तावद्दास्यामीति स चतुर्गुणं दण्डं दद्यात् । य एतावद्धिरण्यं दास्यामीति प्रमाणमुद्दिश्य कारयति स यथोक्तं हिरण्यं दण्डं च दद्याद् इति बार्हस्पत्याः ।
(३) स चेत्कोपं मदं मोहं वापदिशेद्यत्, यथोक्तवद्दण्डमेनं कुर्यात्, इति कौटिल्यः ।
(४) दण्डकर्मसु सर्वेषु रूपमष्टपणं शतम् । शतावरेषु व्याजीं च विद्यात्पञ्चपणं शतम् ॥
अड़तालीस से छियानवे पण तक का जुर्माना किया जाय; इसी को प्रथम साहस दण्ड कहते हैं। बड़े पशु, मनुष्य, खेत, मकान, हिरण्य, सोना और बड़ी कीमत के वस्त्र आदि द्रव्यों पर डाका डालने वाले को दो-सौ पण से पाँच सौ पण तक का दंड दिया जाय; इसी का नाम मध्यम साहस दण्ड है।
(१) स्त्री-पुरुष को जबर्दस्ती बाँधने, बँधवाने वाले और राजाज्ञा से बँधे हुए स्त्री-पुरुष को अनधिकार जबर्दस्ती छोड़ने या छुड़वाने वाले व्यक्ति को पाँच-सौ पण लेकर हजार पण तक का दंड दिया जाय; प्राचीन आचार्यों के मतानुसार यही उत्तम साहस दण्ड कहलाता है।
(२) जो व्यक्ति जान-बूझ कर या सूचना देकर डाका (साहस) डालता है, उसे दुगुना दंड दिया जाय । जो व्यक्ति किसी को डाका डालने के लिए यह कह कर प्रेरित करे कि 'तुम्हारे छुड़ाने पर जितना खर्च होगा, उतना मैं लाऊँगा' उसे चौगुना दंड दिया जाय । जो व्यक्ति 'तुम्हें इतना सुवर्ण दूंगा' इस प्रकार धन की तादाद का प्रलोभन देकर डाका डलवाये, उससे उतना ही सुवर्ण वसूल किया जाय और इसके अतिरिक्त उसे यथोचित दंड दिया जाय; आचार्य बृहस्पति के अनुयायी विद्वानों का ऐसा निर्देश है ।
(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'इस प्रकार साहस कार्य कराने वाले व्यक्ति को यदि वह इसका कारण क्रोध, उन्माद या अज्ञानता बताये तो वही दंड दिया जाय, जो साहस आदि कर्म करने वालों के लिए बताया गया है।'
(४) सब दंडों में प्रति सैकड़ा आठ पणरूप (सरकारी टैक्स) और दंड की रकम सौ से कम होने पर प्रति सैकड़ा पाँच पण व्याजी (सरकारी टैक्स) समझना चाहिए ।