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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्र० ७५ : अ० १८ ] वाक्पारुष्य ३३३

(१) स्वदेशग्रामयोः पूर्वं मध्यमं जातिसंघयोः ।
आक्रोशाद्देवचैत्यानामुत्तमं दण्डमर्हति ॥

इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वाक्पारुष्यं नाम अष्टादशोऽध्यायः,
आदितश्चतुस्सप्ततितमः ।

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व्यक्ति के हाथ-पैर तोड़ने की धमकी दी है और वह ऐसा करने में समर्थ भी है, तो उसे उसकी आमदनी तथा हैसियत के अनुसार यथोचित दंड दिया जाय ।

(१) यदि कोई व्यक्ति अपने देश या गाँव की निन्दा करे तो उसे प्रथम साहस दंड, अपनी जाति तथा समाज की निन्दा करे तो उसे मध्यम साहस दंड और देवालयों की निन्दा करे तो उसे उत्तम साहस दंड दिया जाय ।

धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में वाक्पारुष्य नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।

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