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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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३७०कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ चौथा अधिकरण

(१) उज्झितप्रनष्टनिष्पतितोपलब्धस्य देशकाललाभोपलिङ्गनेन शुद्धिः। अशुद्धस्तच्च तावच्च दण्डं दद्यात्। अन्यथा स्तेयदण्डं भजेत इति रूपाभिग्रहः। (२) कर्माभिग्रहस्तु मुषितवेश्मनः प्रवेशनिष्क्रमणद्वारेण, द्वारस्य सन्धिना बीजेन वा वेधम्, उत्तमागारस्य जालवातायननीध्रवेधम्, आरोहणावतरणे च कुड्यस्य वेधम्, उपखननं वा गूढद्रव्यनिक्षेपग्रहणोपायमुपदेशोपलभ्यम्, अभ्यन्तरच्छेदोत्करपरिमर्दोपकरणमभ्यन्तरकृतं विद्यात्। विपर्यये बाह्यकृतम्। उभयत उभयकृतम्। (३) अभ्यन्तरकृते पुरुषमासन्नं व्यसनिनं क्रूरसहायं तस्करोपकरणसंसर्गं स्त्रियं वा दरिद्रकुलामन्यप्रसक्तां वा परिचारकजनं वा तद्विधाचारमतिस्वप्नं निद्राक्लान्तमाधिक्लान्तमाविग्नं शुष्कभिन्नस्वरमुखवर्णमनवस्थितमतिप्रलापिनमुच्चारोहणसंरब्धगात्रं विलूननिघृष्टभिन्नपाटितशरीरवस्त्रं


(१) यदि अभियोक्ता अपनी भूली हुई, खोई हुई या चोरी गई वस्तु के मिल जाने पर उसके देश, काल तथा अपने हक को साबित कर दे तो वह वस्तु उसी की समझी जाय। यदि साबित न कर सके तो उतनी ही कीमत की वैसी ही दूसरी वस्तु उससे ली जाय और उतना ही उसको दण्ड दिया जाय। या तो उसको चोरी का दण्ड दिया जाय। यहाँ तक चोरी गये माल के सम्बन्ध में कहा गया।

(२) चोर की पहिचान : यदि चोरी हुए घर में चोर पीछे के दरवाजे से घुसे हों, या दरवाजे के जोड़ों से अथवा नीचे से तोड़ कर घुसे हों, या दीवार के चढ़ने के लिए ईंटे निकाल कर अथवा खोद कर जगह बनाई गई हो, या खिड़की तथा रोशनदान तोड़े गए हों, या जहाँ पर धन रखा गया है ठीक उसी जगह दीवार तथा जमीन खोदी गई हो और मकान के भीतर खोदी गई मिट्टी को लापता कर दिया गया हो, तो समझना चाहिए कि इस चोरी में किसी अन्दरूनी व्यक्ति का हाथ है। यदि इससे विपरीत लक्षण दीखें तो बाहरी व्यक्ति की करामात समझनी चाहिए, और दोनों तरह के लक्षण मिलें तो दोनों तरह की चोरी समझनी चाहिए।

(३) यदि चोरी में किसी अन्दरूनी व्यक्ति का हाथ होने का सन्देह हो तो घर के भीतर या आस-पास के व्यक्तियों को पूछ कर उसकी जाँच-पड़ताल इस प्रकार की जाय, जो जुआरी, शराबी, कुमार्गी हो, क्रूर व्यक्तियों तथा चोरों की संगत करने वाला हो, दरिद्र हो, पराये प्रेम में फँसी हुई स्त्री हो, दूसरों की स्त्रियों पर आसक्त नौकर-चाकर हों, बहुत सोने वाला हो, आलसी लगे, मानसिक कष्टों से दुःखी हो, डरा या घबड़ाया हुआ हो, जिसकी आवाज भर्राई हुई हो, चंचल, बकवादी हो, ऊपर चढ़ने के लिए दूसरे की सहायता ले, जिसके शरीर एवं वस्त्रों में रगड़न के निशान