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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्र० ८१ : अ० ६ ] सन्दिग्ध परीक्षा ३७१

जातकिणसंरब्धहस्तपादं पांसुपूर्णकेशनखं विलूनभुग्नकेशनखं वा सम्यक्स्ना-
तानुलिप्तं तैलप्रमृष्टगात्रं सद्योधौतहस्तपादं वा पांसुपिच्छिलेषु तुल्यपाद-
पदनिक्षेपं प्रवेशनिष्कसनयोर्वा तुल्यमाल्यमद्यगन्धवस्त्रच्छेदविलेपनस्वेदं
परीक्षेत । चोरं पारदारिकं वा विद्यात् ।
(१) सगोपस्थानिको बाह्यं प्रदेष्टा चोरमार्गणम् ।
कुर्यान्नागरिकश्चान्तर्दुर्गे निर्दिष्टहेतुभिः ॥
इति कण्टकशोधने चतुर्थेऽधिकरणे शंकारूपकर्माभिग्रहो नाम
षष्ठोऽध्यायः, आदितो द्व्यशीतितमः ।

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हों, जिसके हाथ-पैरों में ठेक पड़ी हो, जिसके बाल तथा नाखून बढ़े हुए हों, स्नान करके जिसने चन्दन का या सुगन्धित तेल का शरीर पर लेप कर दिया हो, मालिश करके जिसने तत्काल ही हाथ-पैर धो दिए हों, धूल या कीचड़ में जिसके पैरों के निशान मिल जायें, जिस पर चोरी गये माल की जैसी गन्ध आती हो, जिसके कपड़े फटे हों, चन्दन लगाने से भी जिस पर पसीना चू रहा हो, इस तरह के पुरुषों से पूछ लेने के बाद ही चोर या व्यभिचारी का पता लगाया जाय ।

( १ ) यदि चोर बाहरी हों तो गोप और स्थानिक की सहायता से प्रदेष्टा उनका पता लगाये । नागरिक भी अपने तरीकों से चोर का पता लगायें ।

कण्टकशोधन नामक चतुर्थ अधिकरण में शंकारूपकर्माभिग्रह नामक छठा अध्याय समाप्त ।

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