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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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४२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण

(१) सार्थिकानां शस्त्रावरणमन्तपाला गृह्णीयुः, समुद्रमवचारयेयुर्वा । यात्रामभ्युत्थितो वा सेनामुद्योजयेत् । ततो वैदेहकव्यञ्जनाः सर्वपण्यान्यायुधीयेभ्यो यात्राकाले द्विगुणप्रत्यादेयानि दद्युः । एवं राजपण्यविक्रयो वेतनप्रत्यादानं च भवति । (२) एवमवेक्षितायव्ययः कोशदण्डव्यसनं नावाप्नोति । (३) इति भक्तवेतनविकल्पः । (४) सत्रिणश्चायुधीयाना वेश्याः कारुकुशीलवाः । दण्डवृद्धाश्च जानीयुः शौचाशौचमतन्द्रिताः ॥

इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे भृत्यभरणीयं नाम तृतीयोऽध्यायः, आदितः त्रिनवतितमः ।

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यार खो जाय या टूट जाय उससे उसका दुगुना मूल्य वसूल किया जाय । आयुधागार में टूटे एवं नष्ट हुए हथियारों का पूरा रिकार्ड रहना चाहिए ।

(१) विदेश से आने वाले व्यापारियों के हथियार सीमा-निरीक्षक अंतपाल ले ले । जिनके पास लाइसेंस हों उन्हें हथियार साथ रखकर प्रविष्ट होने दे । चढ़ाई करने वाले राजा को चाहिए कि अपनी सेना को वह संगठित कर ले । युद्ध के समय व्यापारियों के वेष में फौजियों को दुगुने दाम पर रसद दी जाय । इस प्रकार सरकारी वस्तुएँ भी विक जायेंगी और सिपाहियों को दिये गए वेतन में से कुछ धन खजाने में वापिस मिल जायेगा ।

(२) इस प्रकार आय-व्यय पर ध्यान रखने वाले राजा पर कभी भी आर्थिक या सैनिक आपत्तियाँ नहीं आ पातीं ।

(३) यहाँ तक भत्ता व वेतन के संबंध में बारीकी से विचार किया गया ।

(४) सत्री, वेश्या, कारीगर और वृद्ध सिपाहियों को चाहिए कि वे पूरी सावधानी के साथ सैनिकों के अच्छे बुरे कार्यों का सदा निरीक्षण करते रहें ।

योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में भृत्यभरणीय नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

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