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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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प्रकरण ९२
अध्याय ४

अनुजीविवृत्तम्

(१) लोकयात्राविद् राजानमात्मद्रव्यप्रकृतिसम्पन्नं प्रियहितद्वारेणा- श्रयेत् । यं वा मन्येत–यथाहमाश्रयेप्सुरेवमसौ विनयेप्सुरभिगामिकगुणयुक्त इति, द्रव्यप्रकृतिहीनमप्येनमाश्रयेत । (२) न त्वेवानात्मसम्पन्नम् । अनात्मवान् हि नीतिशास्त्रद्वेषादनर्थ- संयोगाद्वा प्राप्यापि महदैश्वर्यं न भवति । (३) आत्मवति लब्धावकाशः शास्त्रानुयोगं दद्यात् । अविसंवादाद्धि स्थानस्थैर्यमवाप्नोति । मतिकर्मसु पृष्टः तदात्वे च आयत्यां च धर्मार्थ- संयुक्तं समर्थं प्रवीणवदपरिषद्भीरुः कथयेत् । ईप्सितः पणेत—धर्मार्थानु- योगम् अविशिष्टेषु बलवत्संयुक्तेषु दण्डधारणं मत्संयोगे तदात्वे च दण्ड-

राजकर्मचारियों का राजा के प्रति व्यवहार

( १ ) जो व्यक्ति सांसारिक व्यवहारों में कुशल हों उनको चाहिए कि वे राजा के प्रिय एवं हितैषी व्यक्तियों के द्वारा, सत्कुलीन, बुद्धिमान् एवं योग्य अमात्यों से सम्पन्न राजा का आश्रय प्राप्त करें । यदि ऐसा राजा न मिले तो योग्य व्यक्तियों की तलाश करने वाले आत्मसम्पन्न राजा का आश्रय ग्रहण करें ।

( २ ) भले ही आत्म-सम्पन्न राजा के सुयोग्य आमात्य न हों, तब भी उसी का आश्रय लेना चाहिए, किन्तु सुयोग्य अमात्य आदि से सम्पन्न आत्मसंपत्तिरहित राजा का आश्रय कदापि न लेना चाहिए ! क्योंकि आत्म-संपत्ति शून्य राजा नीतिशास्त्र को न जानने के कारण अथवा अनर्थकारी मृगयाद्यूत आदि का व्यसनी होने के कारण, या इस प्रकार के लोगों की संगति करने के कारण पितृ-पितामह के उपलब्ध महान् ऐश्वर्य को भी नष्ट-भ्रष्ट कर देता है ।

( ३ ) यदि राजा आत्मसम्पन्न हो तो अवसर आने पर उसको शास्त्रानुकूल संमति दी जाय । शास्त्र के साथ संमति का मिलान जानकर उसको यह विश्वास हो जाता है कि अमुक व्यक्ति नीतिज्ञ है, और तब उसकी नियुक्ति किसी अधिकार पद पर कर दी जाती है । अति आवश्यक विषयों के सम्बन्ध में राजा जब उससे कुछ प्रश्न पूछे तो उस समय या किसी भी समय वह धर्मार्थविद् अति निपुण लोगों की भाँति निर्भीकता-पूर्वक भरी सभा में उत्तर दे । यदि राजा उसको अमात्य पद पर नियुक्त करना चाहे तो राजा के सामने वह इस प्रकार की शर्तें रखे : जो लोग साधारण बुद्धि के हों और धर्म तथा अर्थ के तत्त्वों को न समझते हों, जिज्ञासा के तौर पर भी उनसे कभी भी

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