कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context४२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण
धारणमिति न कुर्याः । पक्षं वृत्तिं गुह्यं च मे नोपहन्याः । संज्ञया च त्वां कामक्रोधदण्डनेषु वारयेयम् इति ।
(१) आयुक्तप्रदिष्टायां भूमावनुज्ञातः प्रविशेत् । उपविशेच्च पार्श्वतः सन्निकृष्टविप्रकृष्टः । वरासनं विगृह्यकथनमसभ्यमप्रत्यक्षमश्रद्धेयमनृतं च वाक्यमुच्चैरनर्मणि हासं वातष्ठीवने च शब्दवती न कुर्यात् । मिथः कथनमन्येन, जनवादे द्वन्द्वकथनं, राज्ञो वेषमुद्धतकुहकानां च, रत्नातिशयप्रकाशाभ्यर्थनम्, एकाक्ष्योष्ठनिर्भोगं, भ्रुकुटीकर्म, वाक्यावक्षेपं च ब्रुवति । बलवत्संयुक्तविरोधं स्त्रीभिः स्त्रीदर्शिभिः सामन्तदूतैर्द्वेष्यापक्षावक्षिप्तार्थैश्च प्रतिसंसर्गमेकार्थचर्यां सङ्घातं च वर्जयेत् ।
(२) अहीनकालं राजार्थं स्वार्थं प्रियहितैः सह । परार्थं देशकाले च ब्रूयाद् धर्मार्थसंहितम् ॥
इस विषय में कुछ न पूछा जाय, बलवान् या बलवान् सहायकों वाले शत्रु पर आक्रमण न किया जाय, मेरे सम्बन्ध में भी सहसा दण्ड-प्रयोग न किया जाय, मेरे पक्ष को, मेरे व्यवहार या मेरे जीविका के रहस्यों को कदापि भी न खोला जाय न तो नष्ट ही किया जाय, काम-क्रोध के वशीभूत अनुचित दण्ड देने को प्रस्तुत आपको जब मैं इशारों से वारित करूँगा, तो बुरा न मानते हुए इसका ध्यान रखा जाय । मेरी इन शर्तों को पूरा करना होगा ।
( १ ) जिस अधिकार पद पर राजा उसे नियुक्त करे उसी पर वह कार्य करे और राजा के समीप अगल-बगल में, न तो अधिक दूर और न अधिक नजदीक ही यथोचित आसन पर बैठकर वह कार्य करे । आक्षेप लगाकर, असभ्य, परोक्ष विषयक, अविश्वसनीय और झूठी बात वह कदापि न बोले । बेमौके ऊँची आवाज से न बोले । बोलते हुए खकार या डकार कभी न करे । इसके अतिरिक्त राजा की उपस्थिति में किसी दूसरे से बातचीत करना, किसी अफवाह को निश्चित रूप से हाँ या ना कहना, राजा का या पाखण्डियों का वेष धारण करना, राजा के धारण करने योग्य रत्नों के लिए खुले तौर पर प्रार्थना करना, एक आँख या एक ओठ टेढा करके बोलना, भौं चढ़ाना, राजा की बात को बीच में ही काट देना, बलवान् के सम्बन्धी से झगड़ा करना, स्त्रियों के साथ, स्त्रियों को चाहने वालों के साथ, विदेशी दूतों के साथ एवम् राजा के दुश्मनों-या अनर्थकारी व्यक्तियों के साथ सम्पर्क रखना, एक ही बात को करते रहना, और गुटबाजी बनाकर रहना, इत्यादि सभी कार्यों का परित्याग कर दे ।
( २ ) राजा के मतलब की बात तत्काल ही राजा से कह देनी चाहिए, अपने मतलब की बात राजा के प्रिय तथा हितकारी व्यक्तियों से कहनी चाहिए, दूसरे के मतलब की बात उचित समय एवं स्थान देखकर करनी चाहिए, और जो कुछ भी कहे वह धर्म-अर्थ से समन्वित होना चाहिए ।