कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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(१) पृष्टः प्रियहितं ब्रूयान्न ब्रूयादहितं प्रियम् ।
अप्रियं वा हितं ब्रूयाच्छृण्वतोऽनुमतो मिथः ॥
(२) तूष्णीं वा प्रतिवाक्ये स्याद् द्वेष्यादींश्च न वर्णयेत् ।
अप्रिया अपि दक्षाः स्युस्तद्भावाद् ये बहिष्कृताः ॥
अनर्थ्याश्च प्रिया दृष्टाश्चित्तज्ञानानुवर्तिनः ।
अभिहास्येष्वभिहसेद् घोरहासांश्च वर्जयेत् ॥
(३) परात् संक्रामयेद् घोरं न च घोरं स्वयं वदेत् ।
तितिक्षेतात्मनश्चैव क्षमावान् पृथिवीसमः ॥
(४) आत्मरक्षा हि सततं पूर्वं कार्या विजानता ।
अग्नाविव हि सम्प्रोक्ता वृत्ती राजोपजीविनाम् ॥
एकदेशं दहेदग्निः शरीरं वा परङ्गतः ।
सपुत्रदारं राजा तु घातयेद् वर्धयेत वा ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे अनुजीविवृत्तं नाम चतुर्थोऽध्यायः
आदितस्त्रिनवतितमः ।
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( १ ) राजा के पूछने पर उसकी अनुमति से प्रिय एवं हितकारी बात को कह देनी चाहिए, प्रिय होती हुई भी अहितकारी बात को न कहना चाहिए, किन्तु हितकारी बात अप्रिय भी हो तब भी कह देनी चाहिए ।
( २ ) उत्तर देते समय यदि अप्रिय बात सुनाने में डर मालूम हो तो चुप हो जाना चाहिए, राजा के द्वेष्य पुरुषों से सम्बन्ध भी नहीं रखना चाहिए, क्योंकि राजा की इच्छा पर न चलने वाले निपुण लोग भी राजा के अप्रिय बन जाते हैं । इसके विपरीत राजा के इच्छानुसार चलने वाले अनर्थकारी लोग भी राजा के प्रिय होते देखे गये हैं । राजा के हँसने पर, काठ की तरह खड़ा न रहकर, हँसना चाहिये, किन्तु अट्टहास पर सदा नियन्त्रण रखना चाहिए ।
( ३ ) किसी भयावह संदेश को स्वयं न कहकर किसी के द्वारा राजा को कहलावे । यदि अपने ही ऊपर ऐसी किसी बात का दायित्व आ जाय तो पृथ्वी के समान क्षमाशील बनकर उसके परिणाम को सहन करे ।
( ४ ) इसलिए समझदार राजकर्मचारी को चाहिए कि सर्वप्रथम वह अपनी रक्षा की सोचे, क्योंकि राज्याश्रित व्यक्तियों की स्थिति आग में खेल करने से बढ़कर खतरनाक कही गई है । क्योंकि अग्नि तो शरीर के एक अङ्ग या पूरे शरीर को ही जलाती है, किन्तु राजा समस्त परिवार को भस्म कर सकता है, और यदि अनुकूल हो गया तो सर्व सम्पन्न भी कर देता है ।
योगवृत्त नामक पञ्चम अधिकरण में चौथा अध्याय समाप्त ।
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