कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ९३ |
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| अध्याय ५ |
समयाचारिकम्
(१) नियुक्तः कर्मसु व्ययविशुद्धमुदयं दर्शयेत् । (२) आभ्यन्तरं बाह्यं गुह्यं प्रकाश्यमात्ययिकमुपेक्षितव्यं वा कार्यम् 'इदमेवम्' इति विशेषयेच्च । (३) मृगयाद्यूतमस्त्रीषु प्रसक्तं चानुवर्तेत प्रशंसाभिः । आसन्नश्चास्य व्यसनोपघाते प्रयतेत । परोपजापातिसन्धानोपधिभ्यश्च रक्षेत् । (४) इङ्गिताकारौ चास्य लक्षयेत् । कामद्वेषहर्षदैन्यव्यवसायभयद्वन्द्व-विपर्यासमिङ्गिताकाराभ्यां हि मंत्रसंवरणार्थमाचरन्ति प्रज्ञाः । (५) दर्शने प्रसीदति । वाक्यं प्रतिगृह्णाति । आसनं ददाति । विविक्ते दर्शयते । शंकास्थाने नातिशंकते । कथायां रमते । परज्ञाप्येष्वपेक्षते । पथ्य-
व्यवस्था का यथोचित पालन
( १ ) अपने अपने कार्यों पर नियुक्त हुए कर्मचारियों को चाहिए कि वे खर्चे को घटाकर शुद्ध आमदनी ( उदय ) राजा को दिखायें ।
( २ ) कर्मचारियों को चाहिए कि दुर्ग में होने वाले तथा बाहर होने वाले कार्यों का, खुले रूप में तथा छिपकर होने वाले कार्यों का, विघ्नयुक्त एवं उपेक्षायुक्त कार्यों का विवरण स्पष्टरूप में राजा के सामने पेश करें और उन सभी बातों का लेखा रजिस्टर में दर्ज कर दें ।
( ३ ) यदि राजा शिकार, जुआ या स्त्रियों में आसक्त हो तो उसका अनुगामी बन कर, उसकी खुशामद या प्रशंसा करके उसको दुर्व्यसनों से विमुख करने का यत्न करना चाहिए । इसी प्रकार शत्रु के भेदियों, ठगों और विष देने वाले लोगों से भी राजा की रक्षा की जानी चाहिए ।
( ४ ) राजा की चेष्टाओं और आकार-प्रकारों को बड़ी कुशलता से हृदयंगम करना चाहिए, क्योंकि बुद्धिमान् लोग अपने रहस्य को छिपाये रखने के लिए काम, द्वेष, हर्ष, दैन्य; व्यवसाय, भय और सुख-दुःख को चेष्टाओं द्वारा तथा विशेष आकृतियों से ही प्रकट किया करते हैं ।
( ५ ) राजा की प्रसन्नता को इन बातों से भांपना चाहिए : वह देखने पर ही प्रसन्न हो जाता है; बात को बड़े ध्यान एवं आदर से सुनता है, बैठने के लिये उचित