कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ९३ : अ० ५ ] राजा के प्रति व्यवहार ४२९
मुक्तं सहते । स्मयमानो नियुङ्क्ते । हस्तेन स्पृशति । श्लाघ्ये नोपहसति । परोक्षे गुणं ब्रवीति । भक्ष्येषु स्मरति । सह विहारं याति । व्यसनेऽभ्यवपद्यते । तद्भक्तीन् पूजयति । गुह्यमाचष्टे । मानं वर्धयति । अर्थं करोति । अनर्थं प्रतिहन्ति । इति तुष्टज्ञानम् ।
(१) एतदेव विपरीतमतुष्टस्य । भूयश्च वक्ष्यामः—सन्दर्शने कोपः, वाक्यस्याश्रवणप्रतिषेधौ, आसनचक्षुषोरदानं, वर्णस्वरभेदः, एकाक्षिभ्रुकुटचोष्ठनिर्भोगः, स्वेदश्च, श्वासस्मितानामस्थानोत्पत्तिः, परिमन्त्रणम्, अकस्माद् व्रजनम्, वर्धनम् अन्यस्य, भूमिगात्रविलेखनम्, अन्तस्योपतोदनम्, विद्यावर्णदेशकुत्सा, समनिन्दा, प्रतिदोषनिन्दा, प्रतिलोमस्तवः, सुकृतानवेक्षणम्, दुष्कृतानुकीर्तनम्, पृष्ठावधानम्, अतित्यागः, मिथ्याभिभाषणम् । राजदर्शिनां च तद्वृत्तान्यत्वम् ।
आसन देता है, एकान्त में या अंतःपुर में ले जाकर मिलता है, विश्वास के कारण शंकित नहीं होता है, वार्तालाप में रुचि लेता है, समझी हुई बात में भी सलाह करने की इच्छा रखता है, मुस्कुराता हुआ कार्य पर नियुक्त करता है, हितकर कठोर बात को भी सहन करता है, बात करने में हाथ से छू लेता है, प्रशंसा योग्य कार्यों पर प्रसन्न होता है, गुणों की प्रशंसा परोक्ष में करता है, भोजन के समय स्मरण करता है, यात्रा, विहार में साथ में रहता है, दुःख दूर करने में पूरी सहायता देता है, अनुराग रखने वालों का सम्मान करता है, अपने गुप्त रहस्यों को बता देता है, मान-सत्कार बढ़ाता है, इच्छित आर्थिक सहायता देता है और अनर्थ का निवारण करता है ।
( १ ) यदि उक्त सभी बातें राजा में उल्टी पायी जाँय तो समझना चाहिए कि वह क्रुद्ध है । इसके अतिरिक्त राजा की अप्रसन्नता को इन बातों से भाँपना चाहिए, वह देखते ही कुपित हो उठता है, कही गई बात को नहीं सुनता या बीच ही में रोक देता है, बैठने के लिए स्थान नहीं देता, उसकी ओर आँख नहीं उठाता, मुख चढ़ाकर एवं आवाज बदल कर बोलता है; आँख-भौ चढ़ाकर या आँख सिकोड़ कर बोलता है, उसे पसीना आ जाता है, साँस फूलने लगती है, अकस्मात् ही मुस्कुराने लगता है, दूसरे के साथ बात करने लगता है, बीच ही में उठकर चला जाता है, दूसरा ही प्रसंग छेड़ देता है, भूमि एवं शरीर को नाखून से कुरेदने लगता है, किसी को मारने लगता है, विद्या, वर्ण तथा देश की निन्दा करने लगता है, दूसरे समान व्यक्ति के दोष की निन्दा करने लगता है, व्याज-स्तुति करने लगता है, अच्छी तरह किये गये कार्य की भी परवाह नहीं करता है, बिगड़े हुए कार्य को सर्वत्र कह डालता है, लौटते