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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

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४३४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ पाँचवां अधिकरण

(१) परभूमौ राजव्यसने मित्रेणामित्रव्यञ्जनेन शत्रोः सन्धिमवस्थाप्यापगच्छेत् । सामन्तादीनामन्यतमं वास्य दुर्गे स्थापयित्वापगच्छेत् । कुमारमभिषिच्य वा प्रतिव्यूहेत । परेणाभियुक्तो वा यथोक्तमापत्प्रतीकारं कुर्यात् ।

(२) एवमेकैश्वर्यममात्यः कारयेदिति कौटिल्यः ।

(३) नैवमिति भारद्वाजः । प्रम्रियमाणे वा राजन्यमात्यः कुल्यकुमारमुख्यान् परस्परं मुख्येषु वा विक्रामयेत् । विक्रान्तं प्रकृतिकोपेन घातयेत् । कुल्यकुमारमुख्यानुपांशुदण्डेन वा साधयित्वा स्वयं राज्यं गृह्णीयात् । राज्यकारणाद्धि पिता पुत्रान् पुत्राश्च पितरमभिद्रुह्यन्ति; किमङ्ग पुनरमात्यप्रकृतिर्ह्येकप्रग्रहो राज्यस्य । तत् स्वयमुपस्थितं नावमन्येत । स्वमारूढा हि स्त्री त्यज्यमानाभिशपतीति लोकप्रवादः ।

(४) कालश्च सकृदभ्येति यं नरं कालकांक्षिणम् । दुर्लभः स पुनस्तस्य कालः कर्म चिकीर्षतः ॥


(१) यदि राजा की कहीं दूसरे देश में मृत्यु हो जाय तो अमात्य को चाहिए कि वह बनावटी दुश्मन बने हुए मित्र के साथ शत्रु की संधि कराकर अपने देश में चला आवे । अथवा सामन्त आदि में से किसी एक को उसके दुर्ग में नियुक्त करके चला आये और राजकुमार का राज्याभिषेक करके फिर शत्रु के साथ अभियास्यत्कर्म प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा बाहरी-भीतरी आपत्तियों से बचने के लिए प्रतीकार करे ।

(२) इस प्रकार अमात्य एकैश्वर्य राज्य का पालन कराये—यह आचार्य कौटिल्य का मत है ।

(३) किन्तु आचार्य भारद्वाज का मत है कि अमात्य इस प्रकार राजपुत्र को एकछत्र राज्य न कराये, बल्कि उचित तो यह है कि राजा की आसन्न मृत्यु समझ कर अमात्य, राजा के वंशज, राजकुमार और मुख्य व्यक्तियों को परस्पर या दूसरे मुख्यों के साथ भिड़ा दे और फिर प्रजा या राजप्रकृति के कुपित होने के कारण इनको मरवा डाले । अथवा उन राज-वंशज, राजकुमार और मुख्य व्यक्तियों को चुपचाप ( उपांशुदण्ड ) मरवा दे और स्वयं ही संपूर्ण राज्य का स्वामी बन जाय । क्योंकि राज्य के लिए पिता-पुत्र परस्पर अभिद्रोह करते हुए देखे गये हैं । फिर वह अमात्य यदि ऐसा करे, जो सारे राज्य की बागडोर है, तो कुछ भी अनुचित नहीं है । इसलिए स्वयं हाथ में आये हुए राज्य का तिरस्कार न करे, क्योंकि लोक-प्रसिद्धि है कि संभोग की इच्छा लेकर स्वयं ही आई हुई स्त्री को यदि छोड़ दिया जाय तो वह शाप दे देती है ।

(४) चिर-प्रतीक्षित मौका एक बार ही हाथ आता है । उसको चूक जाने पर