कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in contextप्र० ९४-९५ : अ० ६ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३५
(१) प्रकृतिकोपकमधर्मिष्ठमनैकान्तिकं चैतदिति कौटिल्यः। राजपुत्र-मात्मसम्पन्नं राज्ये स्थापयेत्। सम्पन्नाभावे व्यसनिनं कुमारं राजकन्यां गर्भिणीं देवीं वा पुरस्कृत्य महामात्रान् सन्निपात्य ब्रूयात्-‘अयं वो निक्षेपः, पितरमस्यावेक्षध्वं सत्त्वाभिजनमात्मनश्च, ध्वजमात्रोऽयं, भवन्त एव स्वा-मिनः, कथं वा क्रियताम्' इति।
(२) तथा ब्रुवाणं योगपुरुषा ब्रूयुः-‘कोऽन्यो भवत्पुरोगादस्माद् राज्ञ-श्चातुर्वर्ण्यमर्हति पालयितुम् इति' । तथेत्यमात्यः कुमारं राजकन्यां गर्भिणीं देवीं वाधिकुर्वीत, बन्धुसम्बन्धिनां मित्रामित्रदूतानां च दर्शयेत् ।
(३) भक्तवेतनविशेषममात्यानामायुधीयानां च कारयेत् । भूयश्चायं वृद्धः करिष्यतीति ब्रूयात् । एवं दुर्गराष्ट्रमुख्यानाभाषेत, यथार्हं च मित्रा-
फिर वैसा अवसर हाथ नहीं आता है। साँप के निकल जाने पर लकीर पीटने से कोई लाभ नहीं होता।
( १ ) किन्तु भरद्वाज के उक्त मत से कौटिल्य सहमत नहीं है। उसका कथन है कि इस प्रकार की कार्यवाही प्रजा के लिए कष्टकर, अधर्मयुक्त और अनित्य है। इसलिए आत्मसंपन्न राजकुमार को ही अभिषिक्त करना चाहिए। यदि आत्मसंपन्न राजकुमार न मिले तो व्यसनी राजकुमार को, राजकन्या को या गर्भिणी महारानी को आगे करके राष्ट्र के सभी महान् व्यक्तियों के सामने कहा जाय कि 'यह आप लोगों की ही धरोहर है, इसकी रक्षा का भार आप लोगों पर ही है, इस राजकुमार की वंशपरंपरा और अपने दायित्वों की ओर गौर करें। यह राजकुमार तो एक पताका के समान है, जो सबसे ऊँचा रहता हुआ फहराता है, किन्तु इसके राज्य का सारा प्रबन्ध आप ही लोगों पर निर्भर है। अब बतलाइये इस संबंध में क्या करना चाहिए ?'
( २ ) अमात्य के इस प्रकार कहने पर राष्ट्र के वे सम्मानित व्यक्ति कहें 'आपके नेतृत्व के अतिरिक्त इस राजकुमार का दूसरा अवलंब कौन है, जो इस चातु-र्वर्ण्य प्रजा का पालन कर सकने में समर्थ हो ?' 'जो आज्ञा' ऐसा कहकर अमात्य उस राजकुमार या राजकन्या अथवा गर्भिणी महारानी को सिंहासन पर अभिषिक्त कर कर दे। उसके बाद उसके भाई, बन्धु, संबंधी, मित्र, शत्रु तथा दूतों को यह सूचित कर दे कि आज से वही राजा है।
( ३ ) राजा को चाहिए कि वह अमात्यों तथा सैनिकों के भत्ते और वेतन में वृद्धि कर दे। उस समय अमात्य यह कहे कि 'बड़ा होकर यह और भी वेतन वृद्धि