BharatKosha
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 520 of 918

Read in context
Page 520
४३६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पाँचवां अधिकरण

मित्रपक्षम् । विनयकर्मणि च कुमारस्य प्रयतेत । कन्यायां समानजातीयादपत्यमुत्पाद्य वाभिषिञ्चेत् । मातृश्चित्तक्षोभभयात् कुल्यमल्पसत्त्वं छात्रं च लक्षण्यमुपनिदध्यात् । ऋतौ चैनां रक्षेत् । न चात्मार्थं कञ्चिदुत्कृष्टमुपभोगं कारयेत् । राजार्थं तु यानवाहनाभरणवस्त्रस्त्रीवेश्मपरिवापान् कारयेत् ।

(१) यौवनस्थं च याचेत विश्रमं चित्रकारणात् ।
परित्यजेददुष्यन्तं तुष्यन्तं चानुपालयेत् ॥
(२) निवेद्य पुत्ररक्षार्थं गूढसारपरिग्रहान् ।
अरण्यं दीर्घसत्रं वा सेवेतारुच्यतां गतः ॥
(३) मुख्यैरवगृहीतं वा राजानं तत्प्रियाश्रितः ।
इतिहासपुराणाभ्यां बोधयेदर्थशास्त्रवित् ॥


करेगा' । यही आश्वासन वह दुर्ग तथा राज्य के अन्य कर्मचारियों को भी दे, और मित्र तथा शत्रुपक्ष के लोगों से भी यथोचित वार्तालाप करे । राजकुमार की विद्या, विनय और दूसरी प्रकार की शिक्षाओं का भी वह यथोचित प्रबंध करे । अथवा किसी समानजातीय पुरुष से राजकन्या में पुत्र उत्पन्न कराके उसे राज्यसिंहासन पर बैठाये । यदि वह महारानी हो तो उसका चित्त खिन्न न हो, इस अर्थ उसके पास कुलीन, अल्पवयस्क, सौम्य वेदाध्यायी व्यक्ति को नियुक्त कर दे, जिससे कि वह धर्मशास्त्र तथा पुराणों की बातों को सुनाकर उसके ( महारानी के ) चित्त को शान्त बनाये रखे । ऋतुकाल ( मासिक धर्म ) में उसकी पूरी रक्षा की जाय । अमात्य को चाहिए कि वह अपने लिए किसी प्रकार की उत्तम सामग्री संचित न करे । राजा के लिए रथ, घोड़े, आभूषण, वस्त्र, स्त्री, मकान और बढ़िया शयनागार का प्रबन्ध करे ।

( १ ) जब राजकुमार युवा हो जाय और राज्यभार संभाल सके तब उसके मनोभावों को जानने के लिए अमात्य उससे अपना मंत्रिपद छोड़ने के लिए कहे । यदि वह स्वीकार कर ले तो अमात्य को वहाँ से चला जाना चाहिए । यदि वह न जाने को कहें तो फिर उसी के पास रहकर पूर्ववत् राजकाज की व्यवस्था करता रहे ।

( २ ) अमात्य पद पर कार्य करने की इच्छा न होने पर अथवा राजा की ओर से कुछ मन-मुटाव हो जाने पर अमात्य को चाहिए कि वह राजा के पूर्वजों द्वारा स्थापित गुप्तचरों और खजाना आदि राजकुमार को बताकर तपस्या करने के लिए जंगल में चला जाय, अथवा दीर्घकाल तक चलने वाले यज्ञकर्मों का अनुष्ठान करे ।

( ३ ) अथवा मामा, फूफा, आदि मुख्य संबंधियों के वश में हुए राजकुमार को उसके हितेच्छु पुरुषों के आश्रित रहता हुआ ही, तत्त्वविद् अमात्य इतिहास और पुराणों के द्वारा धर्म-अर्थ के तत्त्वों को समझाता रहे ।