कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
DevanagariSanskritpublished918 pages
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प्र० ९४-९५ : अ० ६ ] राजा के प्रति व्यवहार ४३७
(१) सिद्धव्यञ्जनरूपो वा योगमास्थाय पार्थिवम् ।
लभेत लब्ध्वा दूष्येषु दाण्डकर्मिकमाचरेत् ॥
इति योगवृत्ते पञ्चमेऽधिकरणे राजप्रतिसन्धानमेकैश्वर्यं नाम षष्ठोऽध्यायः;
आदितः पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥ ९६ ॥
समाप्तमिदं योगवृत्तं नाम पञ्चममधिकरणम् ।
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( १ ) यदि इस प्रकार भी राजा धर्म-अर्थ के तत्त्वों को ग्रहण न कर सके तो सिद्ध पुरुष का वेष बनाकर वह राजा को अपने वश में करे, और तदनंतर मामा आदि दूष्य पुरुषों पर दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से उनको दण्डित करे ।
योगवृत्त नामक पंचम अधिकरण में राजप्रतिसन्धान-एकैश्वर्य नामक
छठा अध्याय समाप्त
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