कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
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Read in context| प्रकरण ९६ |
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| अध्याय १ |
प्रकृतिसम्पदः
(१) स्वाम्यमात्यजनपददुर्गकोशदण्डमित्राणि प्रकृतयः ।
(२) तत्र स्वामिसम्पत्—महाकुलीनो दैवबुद्धिसत्त्वसम्पन्नो वृद्धदर्शी धार्मिकः सत्यवागविसंवादकः कृतज्ञः स्थूललक्षो महोत्साहोऽदीर्घसूत्रः शक्य-सामन्तो दृढबुद्धिरक्षुद्रपरिषदको विनयकाम इत्याभिगामिका गुणाः ।
(३) शुश्रूषाश्रवणग्रहणधारणविज्ञानोहापोहतत्त्वाभिनिवेशाः प्रज्ञा-गुणाः ।
(४) शौर्यममर्षः शीघ्रता दाक्ष्यं चोत्साहगुणाः ।
(५) वाग्मी प्रगल्भः स्मृतिमतिबलवानुदग्रः स्ववग्रहः कृतशिल्पो व्यसने दण्डनाव्युपकारापकारयोर्दृष्टप्रतिकारी ह्रीमानापत्प्रकृत्योर्विनियोक्ता
प्रकृतियों के गुण
( १ ) प्रकृतियां : १. स्वामी, २. अमात्य, ३. जनपद, ४. दुर्ग, ५. कोष, ६. दण्ड ( सेना ), और ७. मित्र, ये सात प्रकृतियाँ है ।
( २ ) स्वामी के गुण : महाकुलीन, दैवबुद्धि, धैर्यसम्पन्न, दूरदर्शी, धार्मिक, सत्यवादी, सत्यप्रतिज्ञ, कृतज्ञ, उच्चाभिलाषी, बड़ा उत्साही, शीघ्र कार्य करने वाला ( अदीर्घ सूत्र ), समन्तों को वश में करने वाला, दृढ़बुद्धि गुणसंपन्न परिवार वाला ओर शास्त्र बुद्धि, राजा के ये गुण अभिगामिक गुण कहलाते हैं ।
( ३ ) शास्त्रचर्चा, शास्त्रज्ञान, प्रत्येक बात को ग्रहण कर लेना, ग्रहण की हुई बात को याद रखना, ग्रहण की हुई बात का विशेष ज्ञान रखना, तर्क-वितर्क द्वारा किसी बात की तह को पकड़ना, बुरे पक्ष को त्यागना, और गुणियों के पक्ष को ग्रहण करना, आदि राजा के प्रज्ञागुण कहलाते हैं ।
( ४ ) शौर्य, अमर्ष, क्षिप्रकारिता और दक्षता, ये चार गुण उसके उत्साहगुण कहलाते हैं ।
( ५ ) वाग्मी, प्रगल्भ, स्मरणशील, बलवान्, उन्नतमन, संयमी, निपुण सवार, विपत्तिग्रस्त शत्रु पर आक्रमण करने वाला, विपत्ति के समय सेना की रक्षा करने वाला, किसी के उपकार या अपकार का यथोचित प्रतीकार करने वाला, लज्जावान्, दुर्भिक्ष-सुभिक्ष के समय अन्न आदि का उचित विनियोग करने वाला, दीर्घदर्शी-दूरदर्शी