BharatKosha
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

Page 526 of 918

Read in context
Page 526

४४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ छठा अधिकरण

दीर्घदूरदर्शी देशकालपुरुषकारकार्यप्रधानः सन्धिविक्रमतयागसंयमपणपर- च्छिद्रविभागी संवृतादीनाभिहास्यजिह्यभ्रुकुटीक्षणः कामक्रोधलोभस्तम्भ- चापलोपतापपैशुन्यहीनः शक्यः स्मितोग्राभिभाषी वृद्धोपदेशाचार इत्यात्म- सम्पत् । (१) अमात्यसम्पदुक्ता पुरस्तात् । (२) मध्ये चान्ते च स्थानवानात्मधारणः परधारणश्चापदि स्वारक्षः स्वाजीवः शत्रुद्वेषी शक्यसामन्तः पङ्कपाषाणोषरविषमकण्टकश्रेणीव्याल- मृगाटवीहीनः कान्तः सीताखनिद्रव्यहस्तिवनवान् गव्यः पौरुषेयो गुप्तगोचरः पशुमान् अदेवमातृको वारिस्थलपथाभ्यामुपेतः सारचित्रबहुपण्यो दण्डकर- सहः कर्मशीलकर्षकोऽबालिशस्वाम्यवरवर्णप्रायो भक्तशुचिमनुष्य इति जनपदसम्पत् ।


अपनी सेना के युद्धोचित देश-काल-उत्साह एवं कार्य को स्वयं देखने वाला, संधि के प्रयोगों को समझने वाला, युद्ध में चतुर, सुपात्र को दान देने वाला, प्रजा को कष्ट दिए बिना ही कोष को बढाने वाला, शत्रु के व्यसनों से लाभ उठाने वाला, अपने मन्त्र को गुप्त रखने वाला, दूसरे की हँसी न उड़ाने वाला, टेढी भौंहें करके न देखने वाला, काम-क्रोध-लोभ-मोह चपलता-उपताप एव चुगलखोरी ( पैशुन्य ) से सदा अलग रहने वाला, प्रियभाषी, हँसमुख, उदारभावी और वृद्धजनों के उपदेशों एवं आचारों को मानने वाला इन गुणों से युक्त राजा आत्मसंपन्न कहा जाता है ।

( १ ) अमात्य के गुण : अमात्य संपत के सम्बन्ध में विनयाधिकारिक नामक अधिकरण में पहिले कहा जा चुका है ।

( २ ) जनपद के गुण : जनपद की स्थापना ऐसी होनी चाहिए कि जिसके बीच में तथा सीमान्तों में किले बने हों, जिसमें यथेष्ट अन्न पैदा होता हो, जिसमें विपत्ति के समय वनपर्वतों के द्वारा आत्मरक्षा की जा सके, जिसमें थोड़े श्रम से ही अधिक धान्य पैदा हो सके, जिसमें शत्रुराजा के विरोधियों की संख्या अधिक हो, जिसके पास-पड़ोस के राजा दुर्बल हों, जो कीचड़, कंकड़, पत्थर, असर, चोर-जुआरी ( विषम कंटक ), छोटे-छोटे शत्रु, हिंसक जानवर एवं घने जङ्गलों से रहित हो, जो नदी तलाबों से सज्जित हो, जिसमें खेती, खान, लकड़ियों तथा हाथियों के जङ्गल हों, जो गायों के लिए हितकर हो, जिसका जल-वायु अच्छा हो, जो लुब्धकों से रहित हो, जिसमें गाय, भैंस, नदी, नहर, जल, थल, आदि सभी उपयोगी वस्तुएँ हों, जिसमें बहुमूल्य वस्तुओं का विक्रय हो, जो दण्ड तथा कर को सहन कर सके, जहाँ के किसान बड़े मेहनती हों, जहाँ के मालिक समझदार हों, जहाँ नीचवर्ण की आबादी अधिक

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला) · Page 526 of 918 · BharatKosha