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केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished152 pages

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Page 117

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०९ अग्निकी परीक्षा तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमिदं यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥ उन्होंने अग्निसे कहा—‘हे अग्ने ! इस बातको मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ?’ उसने कहा—‘बहुत अच्छा’ ॥ ३ ॥ पद-भाष्य ते तदजानन्तो देवाः सान्त- | उसे न जाननेवाले देवताओंने र्भयास्तद्विजिज्ञासवः अग्निम् | भीतरसे डरते-डरते उसे जाननेकी अग्रगामिनं जातवेदसं सर्वज्ञ- | इच्छासे सत्रसे आगे चलनेवाले कल्पम् अब्रुवन् उक्तवन्तः । हे | सर्वज्ञकल्प जातवेदा अग्निसे कहा— जातवेदः एतद् अस्मद्गोचरस्थं | ‘हे जातवेदः ! हमारे नेत्रोंके सम्मुख यक्षं विजानीहि विशेषतो बुध्य- | स्थित इस यक्षको जानो—विशेष- स्व त्वं नस्तेजस्वी किमेतद्य- | रूपसे मालूम करो कि यह यक्ष क्षमिति ॥ ३ ॥ | कौन है; क्योंकि तुम हम सत्रमें तेजस्वी हो’ ॥ ३ ॥ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्य- ब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥ ४ ॥ अग्नि उस यक्षके पास गया । उसने अग्निसे पूछा, ‘तू कौन है ?’ उसने कहा, ‘मैं अग्नि हूँ, मैं निश्चय जातवेदा ही हूँ’ ॥ ४ ॥ पद-भाष्य तथा अस्तु इति तद् यक्षम् | तब ‘बहुत अच्छा’ ऐसा कहकर अभि अद्रवत् तत्प्रति गतवा- | अग्नि उस यक्षकी ओर अभिद्रुत नग्निः । तं च गतवन्तं | हुआ अर्थात् उसके पास गया । पिपृच्छिषुं तत्समीपेऽप्रगल्भत्वा- | इस प्रकार गये हुए और धृष्ट न तूष्णींभूतं तद्यक्षम् अभ्यवदद् | होनेके कारण अपने समीप चुपचाप खड़े हुए प्रश्न करनेकी इच्छावाले उस अग्निसे यक्षने कहा—‘तू