भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 118

११० केनोपनिषद् [ खण्ड ३ पद-भाष्य अग्निं प्रति अभाषत कोऽसीति । | कौन है ?' ब्रह्मके इस प्रकार एवं ब्रह्मणा पृष्टोऽग्निः अब्रवीत्— | पूछनेपर—'मैं अग्नि हूँ—मैं अग्नि अग्निर्वे अग्निनामाहं प्रसिद्धो जात- | नामसे प्रसिद्ध जातवेदा हूँ'— इस वेदा इति च नामद्वयेन प्रसिद्ध- | प्रकार अग्निने दो नामसे प्रसिद्ध तयात्मानं श्लाघयन्निति ॥ ४ ॥ | होनेके कारण अपनी प्रशंसा करते | हुए कहा ॥ ४ ॥ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदँ सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥ [ फिर यक्षने पूछा— ] 'उस [ जातवेदारूप ] तुझमें सामर्थ्य क्या हैं ?' [ अग्निने कहा— ] 'पृथिवीमें यह जो कुछ है उस सभीको जला सकता हूँ' ॥ ५ ॥ पद-भाष्य एवमुक्तवन्तं ब्रह्मावोचत् | इस प्रकार बोलते हुए उस तस्मिन् एवं प्रसिद्धगुणनामवति | अग्निसे ब्रह्मने कहा—'ऐसे प्रसिद्ध त्वयि किं वीर्यं सामर्थ्यम् इति । | गुण और नामवाले तुझमें क्या सोऽब्रवीद् इदं जगत् सर्वं दहेयं | वीर्य—सामर्थ्य है ?' वह बोला— भस्मीकुर्यां यद् इदं स्थावरादि | 'पृथिवीपर जो यह चराचररूप पृथिव्याम् इति । पृथिव्यामि- | जगत् है इस सबको जला सकता त्युपलक्षणार्थम्, यतोऽन्तरिक्षस्थ- | हूँ—भस्म कर सकता हूँ।' 'पृथिवीमें' मपि दह्यत एवाग्निना ॥ ५ ॥ | यह केवल उपलक्षणके लिये है, | क्योंकि जो वस्तु आकाशमें रहती | है वह भी अग्निसे जल ही | जाती है ॥ ५ ॥