केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 119, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १११ तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥ तब यक्षने उस अग्निके लिये एक तिनका रख दिया और कहा— 'इसे जला' । अग्नि उस तृणके समीप गया, परन्तु अपने सारे वेगसे भी उसे जलानेमें समर्थ नहीं हुआ । वह उसके पाससे ही लौट आया और बोला, 'यह यक्ष कौन है—इस बातको मैं नहीं जान सका' ॥ ६ ॥ पद-भाष्य तस्मै एवमभिमानवते ब्रह्म | इस प्रकार अभिमान करनेवाले तृणं निदधौ पुरोग्रेः स्थापितवत् । | उस अग्निके लिये ब्रह्मने एक तृण ब्रह्मणा 'एतत् तृणमात्रं ममाग्रतः | रखा अर्थात् उसके आगे तृण डाल दह; न चेदसि दग्धुं समर्थः, | दिया । ब्रह्मके ऐसा कहनेपर कि मुञ्च दग्धृत्वाभिमानं सर्वत्र' | 'तू मेरे सामने इस तिनकेको जला; इत्युक्तः तत् तृणम् उपप्रेयाय | यदि तू इसे जलानेमें समर्थ नहीं है तृणसमीपं गतवान् सर्वजवेन | तो सर्वत्र जलानेवाला होनेका सर्वोत्साहकृतेन वेगेन । गत्वा | अभिमान छोड़ दे' वह अपने सारे तत् न शशाक नाशकद्दग्धुम् । | बल अर्थात् उत्साहकृत सम्पूर्ण सः जातवेदाः तृणं दग्धुम- | वेगसे उस तृणके पास गया । शक्तो व्रीडितो हतप्रतिज्ञः तत | किन्तु वहाँ जाकर भी वह उसे एव यक्षादेव तूष्णीं देवान्प्रति | जलानेमें समर्थ न हुआ । निववृते निवृत्तः प्रतिगतवान् न | इस प्रकार उस तिनकेको एतत् यक्षम् अशकं शक्तवानहं | जलानेमें असमर्थ वह अग्नि हतप्रतिज्ञ विज्ञातुं विशेषतः यदेतद्यक्ष- | होनेके कारण लज्जित होकर उस मिति ॥ ६ ॥ | यक्षके पाससे चुपचाप देवताओंके प्रति निवृत्त हुआ—अर्थात् उनके पास लौट आया [और बोला—] 'इस यक्षको मैं विशेषरूपसे ऐसा नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन है ?' ॥ ६ ॥