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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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( १० ) है । इस प्रकार श्रीहर्ष का जन्मस्थान मध्यप्रदेश ( अन्तर्वेद ) का कन्नौज और दूसरा प्रिय निवासस्थान वाराणसी सिद्ध होता है । इस प्रकार श्रीहर्ष के समय और स्थान का कुछ निर्णय हो जाने के बाद उनके चरित्र और व्यक्तित्व का भी आभास प्राप्त करना प्रासंगिक होगा । इस विषय में कुछ तो चरित्र यत्र-तत्र उनके उल्लेख और कुछ वृद्धपरम्परागत गाथाओं का आश्रय लिया जाय, जैसा कि स्वर्गीय त्यक्त-महामहोपाध्याय लक्ष्मण शास्त्री द्राविड़ ने 'खण्डन-खण्डखाद्य' ( विद्यासागरी-सहित, चौखंवा संस्कृत सीरीज, वाराणसी का प्रकाशन, १६१२ ई० ) की भूमिका में लिया है, तो उनका चरित्र इस प्रकार होगा । श्रीहीर नामक एक पण्डित थे । उनकी पत्नी का नाम 'मामल्लदेवी' था । एक- बार श्रीहीर किसी राजसभा में पहुँचे, तो वहाँ उनसे एक महापण्डित से शास्त्रार्थ हुआ, जिसमें श्रीहीर हार गये । तभी से पराभव के दुःख से अत्यन्त सन्तप्त हो उन्होंने भगवती दुर्गा का आराधन किया । उनकी आराधना से भगवती ने प्रसन्न हो उन्हें वर दिया कि आपको समस्त वादियों के खण्डन में कुशल पुत्र होगा । भगवती की कृपा से मामल्लदेवी में उनके द्वारा पुत्र भी हुआ, पर पराभव का शल्य उन्हें चुभता ही रहा, जिससे वे असमय ही रोगाक्रान्त हो चल बसे । मरने के पूर्व उन्होंने पुत्र को बुलाकर कहा : 'वत्स ! मेरे विजेता को जीत कर जब तुम अपनी कीर्ति-वैजयन्ती फहराओगे, तभी परलोकगत भी मेरी आत्मा शान्ति पायेगी ।' छोटे बालक ने पिता के समक्ष प्रतिज्ञा की कि 'जब तक आपके विजेता को जीत न लूँगा, तब तक लोगों को मुँह न दिखाऊँगा ।' पिता के स्वर्गवास के बाद किसी तरह उनका और्ध्वदैहिक कर्म कर तथा अपने आप्तजनों पर परिवार का भार डालकर अत्यन्त दुःखित बालक श्रीहर्ष पिता की इच्छा को सफल करने के निमित्त देश-देशान्तरों में घूमा और चोटी के विद्वानों से भक्तिभाव- पूर्वक उसने विविध शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया । उन्हें एक साधक भी मिल गये, जिन्होंने उन्हें 'चिन्तामणि' नामक मन्त्र दे उसके अनुष्ठान की सलाह दी । किसी नदी के तीर भगवती त्रिपुरसुन्दरी के एक जीर्ण-शीर्ण मन्दिर में बैठ उन्होंने उक्त चिन्तामणि-मन्त्र का जपानुष्ठान किया । इस तरह पाँच वर्ष तप करने के बाद भगवती त्रिपुराम्बा प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा : 'वत्स ! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो ।' श्रीहर्ष ने कहा : मातः ! यदि सचमुच प्रसन्न हो, तो विद्यादान देकर अनुगृहीत करो ।' वरदान देकर

१. स्वर्गीय श्रीभागवताचार्य ने अपनी 'खण्डन-भूमिका' में पिता-पुत्र की वचन-प्रतिश्रुति की यह कथा लिखी है । "बचपन में पिता मर गये और माँ ने बालक को किसी प्रकार पाला । पाँच वर्ष होने पर उसने किसीके मुख से पिता के अपमान की यह कथा सुनी और वह तप के लिए गया ।" वही उन्होंने लिखा है ।