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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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भगवती अन्तर्भूत हो गयीं। चिन्तामणि-मन्त्र का जप और देवी के वर से श्रीहर्ष ने तर्क, अलङ्कार, वेद, वेदाङ्ग आदि निखिल विद्याओं में असाधारण पाण्डित्य प्राप्त कर लिया। फलस्वरूप जल्पकथा में वे ऐसे अपूर्व उत्तर देने लगे, जिन्हें पण्डित भी समझ न पाते थे। किन्तु लोगों को वह समझ में न आने से उनके उद्देश्य की सिद्धि नहीं हो सकती थी। इसलिए पुनः उन्होंने वाग्देवी की उपासना की। वाग्देवी ने प्रत्यक्ष होकर कहा : 'वत्स, यह अतिप्रज्ञा भी तुम्हारे लिए अहितकर हो रही है। इसलिए मध्यरात्रि में सिर पर पानी डालो और जब वह पूरा तर हो जाय, तो दही खाकर सो जाओ। इससे कफ बढ़कर थोड़ी जड़ता आ जायगी। फिर तुम्हारी वाणी सभी समझ पायेंगे। श्रीहर्ष ने वैसा ही किया और सफल-मनोरथ हुए। फिर वे कान्यकुब्जाधीश्वर के दरबार में आये और दरबार के समक्ष दो श्लोक पढ़े। एक श्लोक राजा की प्रशंसा का था और दूसरा अपने पिता के विजेता उस बूढ़े पण्डित को लक्ष्य कर कहा गया था, जो दरबार में उपस्थित था। श्लोक इतना प्रभावशाली रहा कि उसे सुनते ही उक्त पण्डित ने अपनी हार मान ली। राजा ने प्रसन्न हो श्रीहर्ष को अपना राजकवि बना लिया, और ताम्बूल-द्वय और उच्च आसन दिया, जो तत्कालीन बहुत बड़ा सम्मान माना जाता होगा। वहाँ उन्होंने अनेक ग्रन्थ रचे, जिनमें खण्डनखण्ड- खाद्य और नैषधीय-चरित आज उपलब्ध हैं। राजा के विशेष आग्रह पर उन्होंने 'नैषधीय- चरित' महाकाव्य लिखा। कहा जाता है कि काश्मीर के साहित्य-ग्रन्थ और इनके नैषध की तुलना में भारती ने इनके ग्रन्थ के विरुद्ध निर्णय दिया और काश्मीर के ग्रन्थ को श्रेष्ठता दी; कारण इन्होंने अपने ग्रन्थ में सरस्वती की निन्दा की थी। किन्तु श्रीहर्ष ने बाद में अपने उस अंश का स्पष्टीकरण कर उन्हें मना लिया। ये अपना महाकाव्य लेकर काश्मीर के तत्कालीन राजा माधवदेव के पास गये, तो दरबारी पण्डितों ने इन्हें दरबार से मिलने नहीं दिया। एक दिन ये एक कुँए के पास जप करने बैठे थे। वहाँ दो कुमारियाँ दरबार के लिए जल भरने आयीं। दोनों में जल भरने पर कुछ विवाद हुआ और मार-पीट तक की नौबत आयी। अन्ततः झगड़ा राजा तक पहुँचा। राजा ने विवाद के साक्षी की माँग की। उन्होंने जपकर्ता को ही अपना एकमात्र साक्षी बताया। श्रीहर्ष दरबार में बुलाये गये। राजा द्वारा पूछने पर उन्होंने कहा कि 'मैं इनकी भाषा तो नहीं जानता, दोनों द्वारा कही वर्णानुपूर्वी को अवश्य सुना सकता हूँ।' उन्होंने अक्षर-अक्षर दोनों कुमारियों के विवाद की आनुपूर्वी कह सुना दी। राजा इनकी असाधारण धारणा-शक्ति पर अत्यन्त प्रसन्न हुआ और पूरा परिचय प्राप्त कर उसने इनका वस्त्र, आभूषण आदि से बड़ा सम्मान किया। काश्मीरनरेश से सम्मानित हो श्रीहर्ष पुनः अपने आश्रयदाता कान्यकुब्जाधीश्वर के यहाँ आकर रहने लगे। नैषध और खण्डन की उक्तियों के प्रकाश में श्रीहर्ष के व्यक्तित्व का विचार किया जाय, तो कहना होगा कि वे समस्त विद्याओं एवं कलाओं में पूर्ण निष्णात थे। फिर भी किसीके गुणों को व्यक्त न करना वे वाणी की व्यर्थता मानते थे। वे व्यक्तित्व राजसुख और राजवैभव का अनुभव कर चुके थे तथा विलास- सामग्रियाँ भी उन्हें पूर्ण सुलभ थीं। फिर भी वे उनके अधीन न होकर