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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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सत्प्रतिपक्ष और बाध इन पाँच हेत्वाभासों के लक्षणों का खण्डन किया गया है। द्वितीय परिच्छेद में—प्रतिज्ञाहानि, प्रतिज्ञान्तर, प्रतिज्ञाविरोध, प्रतिबन्दी और अपसिद्धान्त इन पाँच निग्रहस्थानों का खण्डन किया गया है। तृतीय परिच्छेद में— केवल किंशब्दार्थ के निर्वचन का खण्डन किया गया है। चतुर्थ परिच्छेद में—भाव, अभाव, विशिष्ट, द्रव्य, गुण, कर्म, विशेष, जाति (सामान्य), आधार, विषय-विषयी- भाव, भेद, कारणत्व, वर्तमानादि काल, प्रागभाव, ध्वंसाभाव, संशय, भावाभाव-विरोध और तर्क का खण्डन किया गया है। इस प्रकार कतिपय प्रमुख पदार्थों का खण्डन करने के बाद ग्रन्थकार ने यह भी बता दिया कि जिन लक्षणों का विस्तार-भय से यहाँ खण्डन नहीं किया गया है, उनका भी इन्हीं युक्तियों से खण्डन कर लिया जाय। ग्रन्थकार ने खण्डन में व्यवहृत अपनी खण्डन-युक्तियों का मार्मिक वर्गीकरण भी कर दिया है। वे कहते हैं : 'तत्तुल्योहस्तदीयं च योजनं विषयान्तरे । शृङ्खला तस्य शेषे न्व त्रिधा भ्रमति मत्क्रिया ॥' अर्थात् किसीसे वाद करने का प्रसंग उपस्थित होने पर हमारे द्वारा इस ग्रन्थ में बतायी गयी युक्तियों के समान युक्तियों की कल्पना कर वादी पर विजय पायें। अथवा उन्हीं युक्तियों की योजना करें। यदि दैववश युक्तियों का स्फुरण न हो, तो घटक अन्य पदार्थों के निर्वचन का प्रश्न कर वादी को परास्त करें। वादि-विजय का श्रीहर्ष का यह शास्त्र अपने ढंग का अद्वितीय है। परवर्ती श्रीचित्सुखाचार्य, श्रीब्रह्मानन्द सरस्वती आदि ने इन युक्तियों का उपयोग कर इसकी कार्यकारिता का प्रमाण उपस्थित कर दिया है। इस प्रकार के वेदान्त-दर्शन के मूर्धन्य इस वादप्रधान दार्शनिक ग्रन्थ का राष्ट्र- भाषा हिन्दी में अनुवाद सचमुच बड़ी टेढ़ीखीर है। कारण एक तो इसके कितने ही स्थल ऐसे हैं, जिनकी ग्रन्थियाँ बड़े-बड़े शब्दज्ञानियों से भी नहीं [आत्म-निवेदन] खुल पातीं। ग्रन्थकार स्वयं ही कहते हैं 'ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित् क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया।' अर्थात् मैंने जान-बूझकर बड़े परिश्रम से इसमें ऐसी ग्रन्थियाँ बाँध दी हैं, जिन्हें प्राज्ञम्मन्य आसानी से न खोल पायें। दूसरे, इन शास्त्रार्थ-विचारों के अनुरूप शैली और शब्द संस्कृत में ही और उसमें भी तथोक्त परिष्कृत, दार्शनिक भाषा में ही सुलभ हो सकते हैं। साधारण संस्कृत में उन्हें रखा जाय, तो भी वे उतने परिष्कृत रूप में नहीं रह सकते । फिर प्राकृत भाषाओं की बात ही क्या ? फिर भी स्वर्गीय पूज्य श्रीचण्डीप्रसाद सुकुलजी ने आज से करीब ५० वर्ष पूर्व' राष्ट्रभाषा हिन्दी में इसे लाने का जो अपूर्व सत्साहस किया, तदर्थ हिन्दी-जगत् उनका सदैव ऋणी रहेगा। कहना होगा कि वे बहुत कुछ इसमें कृतकार्य हुए। फिर भी जैसा कि ऊपर कहा गया है, हिन्दी में इसे लाना मूलतः स्वभाव से दुःशक है, अतः कुछ परिष्कार की *१. इसका प्रथम संस्करण संवत् १६८५ में छपा, पर अनुवादक के कथनानुसार अनुवाद इससे १४ वर्ष पूर्व ही हो चुका था।

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