खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in context( १८ ) आवश्यकता सदैव बनी ही रहेगी। हमारे अध्यक्ष आदरणीय श्री श्रीकृष्ण पन्त जी ने इस द्वितीय संस्करण में मुझे इस सेवा का आदेश दिया, यह मैं उनकी महती कृपा मानता हूँ। किन्तु एक तो मेरा सीमित ज्ञान और दूसरे समय के अत्यधिक संकोच से जितना परिष्कार होना चाहिए, उतना मैं नहीं कर पाया। फिर भी इसका ध्यान रखने का प्रयत्न अवश्य किया है कि परिष्कार के मोह में अपदार्थ न बन जाय। कहीं-कहीं आवश्यक टिप्पणियाँ भी बढ़ा दी गयी हैं। अन्त में परिशिष्ट में खण्डन में ग्रन्थकार द्वारा प्रणीत अकारानुक्रमसहित कारिकाएँ और ग्रन्थ में उद्धृत विभिन्न ग्रन्थों के वचनों का स्थल- निर्देश भी जोड़ दिया गया है। तथापि जो भी इसमें ज्ञात-अज्ञात भूलें हुई हों, ग्रन्थमर्मज्ञ विद्वान् उनको मेरी मान सुधार के सुझाव देने की कृपा करेंगे, तो उनका स्वागत है। प्रस्तुत खण्डन-विमर्श में जिन-जिन पुस्तकों से हमें मदद मिली है, उन सबके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए गुणैकपक्षपाती विद्वानों से इसे अपनाने का हम अनुरोध करते हैं। अच्युत-ग्रन्थमाला, ललिताघाट, वाराणसी } —गोविन्द नरहरि वैजापुरकर वर्षप्रतिपद्, २०१८ वि०