खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in contextपरिच्छेद ] चतुर्थ प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २२३ एतेन ज्ञातता काचिद्विलक्षणा, तज्जनकत्वं ज्ञानस्य साक्षात्त्वमिति निरस्तम् । ऐकरूप्याव्यवस्थितौ कारणत्वानवधारणात् । न च ज्ञाततावैलक्षण्यान्यथानुपपत्तेरेव तत्सिद्धिः; कारणान्तरवैलक्षण्यादेव तदुपपत्तेः । नापि मेयजनितत्वम्; अतिप्रसङ्गात् । स्वमेयजत्वे च स्वार्थव्यावृत्त्याऽननु- गमात्, पूर्वदोषानिवृत्तेश्च । अथ येन प्रमिते सति न प्रमित्सा पुनर्भवति, तज्ज्ञानं साक्षात्कारीति । तन्न; प्रत्यक्षावगतेऽपीष्टे तनयादौ प्रमित्सादर्शनात् । अथ यदनन्तरं न विजातीयप्रमित्सा, तद्भावस्तथात्वम् । तन्न; तत्साजात्या- समर्थन—'अपरोक्ष-व्यवहार की जनक अर्थनिष्ठ जो विलक्षण ज्ञातता है, उसका जनक ज्ञान प्रत्यक्ष है।' खंडन—जबतक जनक प्रमा में ऐकरूप्य (अवच्छेदक धर्म) का ज्ञान न हो, तबतक जनकत्व का ज्ञान न होगा। एवञ्च जनकत्वघटित उक्त लक्षण का ज्ञान भी नहीं होगा। यदि कहें कि अनुमिति के विषय में स्थित ज्ञातता से विलक्षण ज्ञातता की अन्यथानुपपत्ति से प्रमागत विलक्षण ऐक्य का आक्षेप होगा, तो वह भी ठीक नहीं। क्योंकि इन्द्रिय, परामर्श आदि कारणों के वैलक्षण्य से ही ज्ञातता के वैलक्षण्य की उपपत्ति हो जाने से वैलक्षण्य की अन्यथानुपपत्ति ही नहीं है। समर्थन—'मेय (अर्थ) से जन्य ज्ञान प्रत्यक्ष है।' खण्डन—आत्मरूप मेय से सभी ज्ञान जन्य हैं, अतः सभी ज्ञान प्रत्यक्ष हो जायेंगे। समर्थन—स्वमेय से जन्य ज्ञान को प्रत्यक्ष कहेंगे। आत्मा स्वमेय नहीं है, अतः अन्य ज्ञानों में अतिव्याप्ति नहीं। खंडन—यदि स्वशब्द को तत्तद् ज्ञानव्यक्तिपरक मानें, तो जिस ज्ञानव्यक्ति का स्वशब्द से उपादान करेंगे, उससे अन्यत्र अव्याप्ति हो जायगी। यदि स्वशब्द से ज्ञानमात्र का उपादान करें, तो यत्किञ्चित् ज्ञान का विषय आत्मा भी है, अतः ज्ञानमात्र प्रत्यक्ष हो जायेंगे। समर्थन—'जिस ज्ञान से प्रमित अर्थ की पुनः प्रमित्सा (यथार्थज्ञान की इच्छा) न हो, वह ज्ञान प्रत्यक्ष है।' खंडन—पुत्र आदि अतिप्रिय वस्तुओं का एकबार अवलोकन होने पर भी पुनः अवलोकन की इच्छा होती है। अतः पुत्र आदि के प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—'जिस ज्ञान से प्रमित वस्तु में विजातीय प्रमिति की इच्छा न हो, वह प्रत्यक्ष है। पुत्रदर्शन के बाद पुनः उसके दर्शन की इच्छा होने पर भी विजातीय अनुमिति आदि की इच्छा नहीं होती। अतः पुत्रावलोकन में अव्याप्ति नहीं है। खण्डन—जबतक