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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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२२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम नवगतौ तद्विजातीयानवगतेः, अरिसम्पद्यनुमादिविषयायां प्रत्यक्षयितुमनिष्टेश्च। प्रत्यक्षावगतेऽपि दहने रक्ताशोकस्तबकसन्देहे धूमदर्शनेन वह्नेरनुमीयमानत्वा- दित्यप्येके। अज्ञायमानासाधारणकारणकानुभवत्वं कारणविशेषणीकृतभावत्वं वा साक्षा- त्कारित्वमिति चेन्न। दीर्घादिप्रत्यक्षाव्यापनात्, तत्रावधिप्रभृतेः प्रतीयमानस्या- पेक्षणात्। नावधिस्तत्र ज्ञायमानस्तथा, अवधिज्ञानं तु स्यात्। अतीतादावप्यवधौ तथा- प्रत्यक्षनिष्ठ समान जाति का ज्ञान न हो, तबतक प्रत्यक्ष के विजातीयत्व से घटित उक्त लक्षण का ज्ञान नहीं हो सकता । यदि उक्त लक्षण से साजात्य का ज्ञान मानें, तो उक्त लक्षण से साजात्यज्ञान तथा साजात्य के ज्ञान से उक्त लक्षण का ज्ञान इस रीति से अन्योन्याश्रय हो जायगा । यदि अन्य से साजात्य का अवगम हो, तो प्रथम उपस्थित ( ज्ञात ) होने से वही लक्षण रहे, यह लक्षण व्यर्थ है। किञ्च—शत्रुधन की अनुमिति होने पर भी विजातीय प्रत्यक्ष ज्ञान की इच्छा नहीं होती, अतः उसकी अनुमिति में अतिव्याप्ति हो जायगी। किंच--जहाँ प्रत्यक्ष से वह्नि का सामान्यतः अवगम हो गया हो, वहाँ भी वह्नि में रक्ताशोक के स्तबक ( गुच्छ ) का सन्देह होने पर धूम से अनुमिति होती है । अतः उस प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं। समर्थन—'जिस अनुभव का असाधारण कारण अज्ञात हो, वह प्रत्यक्ष है' अथवा 'जिस अनुभव का भावरूप असाधारण कारण अज्ञात हो, वह प्रत्यक्ष है।' [जो अनुपलब्धि को पृथक् प्रमाण मानते हैं, उनके मत में अभाव-प्रमा में प्रत्यक्ष-लक्षण की अव्याप्ति के वारण के लिए असाधारण कारण में भावत्व विशेषण देकर इस द्वितीय लक्षण का प्रणयन है। ] खण्डन—-'अयं दण्डो ह्रस्वः', 'अयं दीर्घः' इस प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी, क्योंकि इस प्रत्यक्ष में अवधिज्ञान की अपेक्षा है। समर्थन—इस प्रत्यक्ष में ज्ञात अवधि कारण नहीं, किन्तु अवधि का ज्ञान कारण है; क्योंकि अतीत, अनागत अवधि से भी ह्रस्वादि का ज्ञान होता है। खंडन—अतीत, अनागत धूमस्थल में वह्नि की अनुमिति होने से ज्ञात धूम भी अनुमिति का करण नहीं; किन्तु धूम का ज्ञान ही अनुमिति का कारण है। अतः अनुमिति अज्ञातकरणक होने से उसमें प्रत्यक्ष-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी।

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