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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] चतुर्थ प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २२५ प्रत्ययादिति चेत् ; तुल्यं लिङ्गे धूमादावपि, धूमदर्शनात् ‘तत्राग्निर्रासीदि’ति पश्चादप्यनुमानात् । ज्ञानविशेषणतया तु ज्ञेयहेतुता तुल्यैवेति । असाधारणकारणगिरा करणमभिमतमिति चेन्न । अनुमितभाविलिङ्गकभावि- लिङ्गचानुमितौ असतो लिङ्गस्य करणत्वासम्भवेन ज्ञायमानकरणकत्वाभावात् । लिङ्गज्ञानं तावत्करणम्, तच्च स्वप्रकाशवादिनो मम ज्ञायमानमेव तत्रेति चेन्न । तस्यापि ज्ञायमानतया करणकोटिप्रवेशे प्रमाणाभावात् उक्तप्रत्ययानां तथात्वाभावात् । अन्यथासिद्धस्यापि ज्ञायमानत्वस्यावर्जने चक्षुराद्यनुमित्यनन्तरं दैवोपजात- घटादिप्रत्यक्षाव्यापनात् । समर्थन—धूमज्ञान का विशेषण धूम ज्ञात ही अनुमिति का कारण होता है । अतः ज्ञातकरणक होने से अनुमिति में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—अवधिज्ञान का विशेषण अवधि भी ज्ञात ही करण होती है । अतः तुल्ययुक्ति से ह्रस्वादि प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—‘असाधारण कारण' शब्द ही ‘करण'परक है। ह्रस्वादि-प्रत्यक्ष में अवधि- ज्ञान करण नहीं, किन्तु इन्द्रिय करण हैं और वे अज्ञात ही हैं। अतः ह्रस्वादि-प्रत्यक्ष में अव्याप्ति नहीं होगी। खण्डन—जिस यज्ञशाला में होमसामग्री से भावी धूम की अनुमिति- कर पश्चात् वह्नि की अनुमिति होती है, वहाँ उस काल में असत् धूम करण हो ही नहीं सकता । किन्तु धूमज्ञान ही करण है और वह अज्ञात ही करण होता है । अतः उस अनुमिति में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—लिङ्गज्ञान ही करण है और ज्ञान को स्वप्रकाश माननेवाले हमारे मत में वह ज्ञात ही करण होता है। अतः अनुमिति के ज्ञातकरणक हो जाने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है। खंडन—लिङ्गज्ञान अनुमिति में ज्ञातरूप से करण है, इसमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि कहें कि स्वप्रकाश होने से लिङ्गज्ञान ही . ज्ञातरूप से स्व के करण होने में प्रमाण है, तो वह युक्त नहीं। कारण, स्वप्रकाश होने से इतना ही सिद्ध होगा कि अनुमिति के जननकाल में लिङ्गज्ञान ज्ञात रहता है । ज्ञातरूप से करण है, यह बात सिद्ध नहीं हो सकती । समर्थन—लिङ्गज्ञान ज्ञातरूप से करण न हो, अनुमिति के जननकाल में ज्ञात तो होता ही है । अतएव ज्ञातकरणक हो जाने से अनुमिति में प्रत्यक्षलक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—जिस स्थल में 'रूप का प्रत्यक्ष करणजन्य है, कार्य होने से, घटादि के तुल्य' इस प्रकार चक्षुरादि की अनुमिति होती है, वहाँ दैववश या रूप- प्रत्यक्षरूप प्रमाण के बल से कदाचित् घटादि प्रत्यक्ष भी हो जाता है । फलतः उस प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । अतः आप को कहना होगा कि जिस ज्ञान का करण २६