खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in contextपरिच्छेद ] सप्तम प्रत्यक्ष-लक्षण का खंडन २३१ अनिष्टभ्रमबुद्धिमते षोढासन्निकर्षस्य प्रत्येकमिलितविकल्पानुपपत्तेः । सप्तम-प्रत्यक्षलक्षण-खण्डनम् साक्षाद्धीः स्वरूपधीः = स्वेन रूपेण वस्तुनो भानमिति चेन्न । अनु- मानादिव्यापनात् । अनुमानादौ लिङ्गाद्यपेक्षत्वात् तदवच्छिन्नकालसम्बद्धवोधत्वं न त्वध्यक्ष इति चेन्न । व्यभिचारात् । यत्र लिङ्गादि भाव्यादिबोधकं तत्र तत्कालताव्यभिचारात् । एतेन यदि न लिङ्गकालावच्छिन्नव्यापकप्रतिभासोऽनुमा तदा कूटव्याप्या- नुमितस्य व्यापकस्य दैववशात् सत्यव्याप्यव्यञ्जकन्तरवतः प्राप्तौ व्याप्तिकाला- वच्छिन्नव्यापकाप्राप्त्या तावत्यंशे प्रमात्वं प्रमाविशेषान्तर्भावानिर्वाह्यमापद्येतेति यदि अख्यातिवादी कहें कि हमारे मत में भ्रम नहीं होता, अतः भ्रम में अव्याप्ति नहीं है; तो भी एक-एक सन्निकर्ष से इतर लें अथवा षट् सन्निकर्ष से, संयुक्तसमवाय उभयथा संयोगादि-षट् से इतर है ही। अतः संयुक्तसमवाय से जन्य प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । सप्तम प्रत्यक्ष-लक्षण का खण्डन समर्थन—'स्वरूप का ज्ञान अर्थात् जो धर्म जिसमें हो, उस धर्म से विशिष्ट उस धर्मी का ज्ञान प्रत्यक्ष है।' खण्डन—अनुमिति में भी जो धर्म जिसमें है, उस धर्म से विशिष्ट ही धर्मीका उल्लेख होता है। अतः वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'लिङ्गादि-काल से अनवच्छिन्न धर्मी की जो बुद्धि है, वही स्वरूप-धी है और वही प्रत्यक्ष का लक्षण है।' अनुमिति में लिङ्गकाल से अवच्छिन्न धर्मी भासता है, अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—जिस स्थल में विशिष्ट मेघोदय से भावी वृष्टि की अनुमिति करते हैं, उस स्थल में लिङ्गकाल से अनवच्छिन्न ही धर्मी भासता है। अतः उस अनुमिति में अतिव्याप्ति सुस्थिर ही है। कोई आचार्य कहते हैं कि 'अनुमिति में साध्य के विशेषणरूप से लिङ्गकाल से अवच्छिन्नत्व भासता ही है। अन्यथा पर्वत में धूलीपटल में धूमभ्रम के अनन्तर उत्पन्न 'पर्वतो वह्निमान्' यह ज्ञान प्रमा हो जायगा । 'उक्त ज्ञान प्रमा ही है' ऐसी इष्टापत्ति आप नहीं कह सकते । कारण, स्वीकृत प्रमा में अन्तर्भाव न होने से उक्त ज्ञान को पञ्चमी प्रमा मानना पड़ेगा, जो अनिष्ट है।' किन्तु उनका यह कथन भी खण्डित जानना चाहिए, कारण भूत-भाविसाध्यक स्थल में व्यभिचार होने के कारण लिङ्गकाल से