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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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निरस्तम्। भूतादिव्यापकानुमाने व्याप्यकालत्वासम्भवात् । तथापि चाग्न्यादि- मदंशमात्रे प्रमात्वापातदुष्परिहरस्त्वयोक्तत्वात् । अनुपहितप्रतीतिः साक्षाद्धीरिति चेन्न । विशिष्टप्रविष्टविशेष्यप्रत्यक्षाव्यापनात् । करणानुपहितत्वं विवक्षितमिति चेन्न । परकरणोपहिताव्यापनात् । स्वकरणोप- हितत्वस्य च स्वपदकुक्षिनिक्षिप्तत्वात् । व्याप्याद्युपहितत्वादीनां व्यतिरेकस्य यत्र समुच्चयः, सा धीः साक्षाद्धीरिति चेन्न । व्याप्यादिप्रत्यक्षाव्यापनात्, असिद्धत्वाच्च । पर्वतोऽग्निमानित्येव प्रतिज्ञा- नात्; शब्देन च स्वाप्रतिपादनात्, शाब्दादिमितेश्च प्रत्यक्षत्वापादनात् । अवच्छिन्नत्व साध्य के विशेषणरूप से नहीं भासता। किञ्च—लिङ्गकाल से अवच्छिन्नत्व का अनुमिति में भान मानें, तब भी विशिष्ट अंश में उक्त ज्ञान प्रमा न होगा, किन्तु वह्नि-अंश में प्रमा हो ही जायगा । समर्थन—'अनुपहित वस्तु का जो ज्ञान है, वह प्रत्यक्ष है।' खंडन—विशेषण से उपहित विशेष्य के प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'करण से उपहित जो न हो, उसका ज्ञान प्रत्यक्ष है।' खंडन—घट के करण दण्ड से उपहित पुरुषविषयक 'दण्डी पुरुषः' इत्याकारक प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'स्वकरण से अनुपहित का जो ज्ञान है, वह प्रत्यक्ष है।' खंडन--यह परिष्कार भी स्वपदरूप सिंह की कुक्षि में निक्षिप्त है। अर्थात् स्वपद के निवेश से ही खण्डित है। कारण स्वपद को यदि करण व्यक्तिपरक मानें, तो जिस धूम व्यक्ति को स्वशब्द से ग्रहण करेंगे, उससे अन्य धूम से उपहित वह्नि की अनुमिति में अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि स्वपद को करणसामान्यपरक मानें, तो अन्य के करण दण्ड से उपहित पुरुषादि के प्रत्यक्ष में अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—'व्याप्यादि के उपहितत्व का अभाव जिस ज्ञान में हो, वह प्रत्यक्ष है।' खण्डन—'वह्निव्याप्यो धूमः' इस व्याप्ति के प्रत्यक्ष में धूम के विशेषणरूप से व्याप्ति भासती है, अतः उसमें अव्याप्ति हो जायगी। किञ्च—अनुमिति आदि में व्याप्ति आदि का भान नहीं होता । कारण, अनुमान में 'पर्वतो वह्निमान्' इत्याकारक ही प्रतिज्ञावाक्य होता है, 'व्याप्य-धूमव्यापकवान्' ऐसा नहीं होता । शब्द से भी स्व (शब्द) से उपहित अर्थ का बोध नहीं होता । अतः यह विशेषण देने पर भी शाब्दबोध और अनुमिति में अतिव्याप्ति बनी ही रहेगी ।