खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in context: परिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन २६७ अथवा गवयपदमसम्भवत्प्रवृत्तिनिमित्तान्तरमनुपपद्यमानाप्तोक्तगोसादृश्य- सामानाधिकरण्यमर्थाद् गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तकतामाक्षिपेदित्यर्थापत्तिरेवात्र प्रमाण- मस्तु । सा च त्वया व्यतिरेकीकृत्य परेण पृथगेवावश्यं प्रमाणीयेति । शब्द-लक्षण-खण्डनम् शब्दोऽपि क उच्य ? आप्तवाक्यं हि शब्दः प्रमाणमिति न युक्तम् ; विकल्यानुपपत्तेः । तथा हि— कोऽयमाप्तो नाम ? यथादृष्टवादीति चेन्न । भ्रान्तिप्रतिपन्नवादिवाक्येऽपि प्रसङ्गात् । प्रमाण- दृष्टेति विशेषणे च तथाभूतस्यान्यथावाद्यव्यापनात् । अथवा 'गवय' शब्द के 'गवयत्व' रूप प्रवृत्तिनिमित्तकत्व के बिना उसमें आप्तपुरुषों से उक्त 'गोसदृश' शब्द का सामानाधिकरण्य अनुपपद्यमान है। अतः वह अपने गवयत्वप्रवृत्तिनिमित्तकत्व का आक्षेप करेगा। इस तरह अर्थापत्ति ही प्रमाण रहे । उसे आप नैयायिक व्यतिरेकी अनुमानरूप और अन्य मीमांसकादि पृथक् प्रमाणरूप मानते ही हैं। गोत्व कथंचित् कालिकादि सम्बन्ध से गवय में रहता है, अतः उसको प्रवृत्तिनिमित्त मानने में गौरव है । एवञ्च प्रसिद्धपद के समभिव्याहार से जनित अन्यथा- नुपपत्ति ही सम्बन्ध-प्रमिति का मूल होने से उपमान नामक कोई प्रमाणान्तर ही नहीं है। शब्द-लक्षण का खण्डन प्रमाणभूत शब्द भी क्या वस्तु है ? अर्थात् शब्द-प्रमाण का लक्षण न हो सकने से वह भी अनिर्वचनीय ही है। निर्वचन —'आप्त का वाक्य ही प्रमाण-शब्द है' ऐसा लक्षण हो सकने से वह अनिर्वचनीय नहीं है। खंडन—यह लक्षण युक्त नहीं, कारण आप्तत्व की निरुक्ति ही नहीं हो सकती। कहिये, आप्त कौन है ? निर्वचन—'जैसा देखा हो, वैसा ही कहनेवाला आप्त है।' खंडन—तब तो भ्रम से शुक्ति को रजतत्वरूप से देखकर जो शुक्ति को रजत कहता है, वह भी आप्त हो जायगा। कारण उसने जैसा देखा है, वैसा ही कहा है। ३८