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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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Page 315

२६८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम यथाप्रमाणेति करणे चांशे तथाभूतवादिवाक्यस्यायथार्थस्यापि व्यापनात् । यावद्यथाप्रमाणदृष्टनिरुक्तौ च प्रायेणातथाभूतत्वादेव लक्ष्याणां तदव्याप्तेः। नहि यावत्प्रमितं तावदभिधीयते । यथाप्रमितस्यैव च वक्तुर्वाक्यमिति व्याकारे च युधिष्ठिरवाक्यस्यापि अनेवम्भूतत्वेनाव्याप्त्यापत्तेः । तत्र विषय इति विशेषणे च विशेषरूपस्य विषयस्यासाधारयेन अव्यापकत्वापातात् । अथ निर्दोषस्य वाक्यं तथेति चेन्न । सदोषस्य ‘नास्ति घटः' इत्यभिधित्सतः 'अस्ति घटः' इति दैवान्निर्गतयथार्थवाक्याव्याप्तेः । तत्प्रमाणं न भवत्येवेति चेन्न। समर्थन—'प्रमाण से जो दृष्ट हो, उसे कहनेवाला आप्त है।' खण्डन—'प्रमाण से दृष्ट शुक्ति को इदानीं रजत कहनेवाला भी आप्त हो जायगा। समर्थन— 'प्रमाण से जैसा देखा हो, वैसा ही कहनेवाला आप्त है।' खण्डन— रङ्ग (राँगे) में 'इमे रङ्ग-रजते' इस भ्रमस्थल में उक्त वाक्य का वक्ता भी आप्त हो जायगा, कारण रङ्गत्वरूप से प्रमाणदृष्ट को रङ्गत्वरूप से भी वह कहता ही है। समर्थन—'जितनी वस्तुएँ जिन रूपों से प्रमाण द्वारा दृष्ट हों, उतनी ही वस्तुओं को उन्हीं रूपों से कहनेवाला आप्त है।' खण्डन—प्रायः ऐसे उदाहरण नहीं मिलते, अतः असम्भव हो जायगा । जिस-जिस रूप से वस्तु प्रमित होती है, उन सभी रूपों से वस्तु का एक साथ कथन हो नहीं सकता । समर्थन—'जैसा जो प्रमित हो, वैसे ही उसीको जो कहे, अप्रमित को कदापि न कहे, ऐसे वक्ता का वाक्य प्रमाण है।' खंडन—युधिष्ठिर जो आप्तस्वरूप से प्रसिद्ध हैं, उनके वाक्य में भी अव्याप्ति हो जायगी । कारण उन्होंने भी कभी अप्रमित 'अश्व- त्थामा हतो नरो वा हस्ती वा' यह वाक्य कहा था । समर्थन—'जैसा जो प्रमित हो, उसे वैसा ही कहनेवाला उस विषय में आप्त है और उसी विषय में उसका 'वाक्य प्रमाण है।' खंडन—लक्षण में यत्शब्द को 'तद्व्यक्तिपरक ही मानेंगे, अतः जिस व्यक्ति का ग्रहण करेंगे, उससे अन्य व्यक्ति में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'निर्दोष पुरुष का वाक्य प्रमाण-शब्द है।' खण्डन—घटवत् भूतल में आशय-दोष से 'नास्ति घटः' यह कहना चाहनेवाले भी सदोष पुरुष के मुँह से दैववश निकला हुआ 'अस्ति घटः' यह वाक्य भी प्रमाण न कहलायेगा, कारण उसका