खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in contextपरिच्छेद ] शब्द-लक्षण का खण्डन २६६ पूर्वमुक्तोत्तरत्वात् । प्रवृत्तिसामर्थ्येन प्रामाण्यावधारणसम्भवादापातः सन्देहेऽप्य- दोषात् । सामान्यतो निर्दोषत्वस्य भोमाग्रजेऽप्यभावात्, विशेषतस्तथात्वस्य असाधारण्यपर्यवसायित्वात् । यथार्थवाक्यं शब्दः प्रमाणमित्यत्र को दोष इति चेन्न । पूर्वोक्तयाथार्थ्यदूष- णानि तावत्प्रथमः । यथार्थमिति विशेषणस्य व्यवच्छेदकत्वाऽव्यवच्छेदकत्वयोः पूर्ववद्दोषश्च द्वितीयः । वाक्यत्वानिरुक्तिश्च तृतीयः । तथाहि—किमिदं वाक्यं नाम ? प्रयोक्ता सदोष ही है। 'वह वाक्य अप्रमाण है' यह नहीं कह सकते; कारण उसका विषय अबाधित है और संवादी प्रवृत्ति होने से उसमें प्रामाण्य ही सम्भव है। सदोष पुरुष का वचन होने से उसमें आपाततः सन्देह हो, तो भी कुछ हानि नहीं। किञ्च—यदि निर्दोष शब्द का अर्थ सब दोषों से रहित मानें, तो युधिष्ठिर भी ऐसे नहीं हैं। यदि यत्किञ्चित् दोष के अभाव से विशिष्ट को निर्दोष शब्दार्थ मानें, तो लक्षण सर्वलक्ष्यसाधारण न होने से अननुगम हो जायगा । अर्थात् यदि वञ्चनारूप दोष के अभाव का लक्षण में निवेश करें, तो तदभावविशिष्ट वक्ता के वाक्यमात्र में समन्वय हो जायगा, पर लोभरूप दोषा- भावविशिष्ट वक्ता के वाक्य में समन्वय नहीं होगा । समर्थन—'यथार्थवाक्य शब्द-प्रमाण है' इस लक्षण में क्या दोष है ? खंडन— प्रथम तो 'यथार्थानुभवः प्रमा' इस लक्षण के खण्डन में उक्त दोष होंगे । अर्थात् यदि वाक्य में अर्थसादृश्य प्रमेयत्वरूप से ग्रहण करें तो आभासवाक्य में अतिव्याप्ति हो जायगी । अतः 'यथार्थज्ञानजनक वाक्य प्रमाण है' ऐसा लक्षण करना होगा । इस लक्षण में भी यदि यत्किञ्चित् रूप से सादृश्य का ग्रहण करें, तो भ्रान्तिज्ञान प्रमेयत्वरूप से अर्थसदृश होने से तज्जनक वाक्य में अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि भासमान आकार से सादृश्य का ग्रहण करें, तो 'रूपी घटः' इस वाक्य में अव्याप्ति हो जायगी; कारण रूपकत्त्व से ज्ञान में अर्थसादृश्य नहीं है, आदि दोष होंगे । इसी तरह यदि अयथार्थ वाक्य को 'यथार्थ' इस विशेषण का व्यवच्छेद्य मानें, तो जो अंशतः यथार्थ और अंशतः अयथार्थ वाक्य है, वह यथार्थ अंश में भी प्रमाण न होगा । यदि व्यवच्छेद्य न मानें, तो यथार्थविशेषण व्यर्थ हो जायगा—यह द्वितीय दोष है । वाक्यत्व की अनिरुक्ति तृतीय दोष है। देखिये—वाक्य क्या वस्तु है ? अर्थात् उसका निर्वचन नहीं हो सकता ।