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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] अनुपलब्धि-लक्षण का खण्डन ३१३ अत एव नाव्‍यवधानमधिकं कारणमेष्टव्यम्, इन्द्रियसन्निकर्षे एव तदुपपत्तेः । न चाऽऽश्रयसाक्षात्कारोऽपि, प्राङ्नास्तिताग्रहादौ व्यभिचारात् । ननु व्यवधायकसद्भावेऽपि यत्र परमार्थतोऽस्त्यभावः, तत्रोक्तकारणाद्भावा- वधारणमस्त्येव को विरोधः । स न तावद्भावयोगिन्यपि तावता तद्विरहग्रमा प्रसज्येत । तर्हि प्रतियोग्यभावसहितोऽनुपलम्भ एवाभावप्रमाणमस्तु, जहीहि योग्यताविशेषणनिवेशव्यसनम् । योग्यताविशेषणाप्रक्षेपेऽनुपलम्भमात्रतो वस्तु- गत्या प्रतियोग्यभाववत्यपि न भावनिश्चयः । कदाचित्तु संशयो जायते, तत्कथं तथाऽङ्गीक्रियत इति चेत् ; तर्हि व्यवधानेऽप्येवमेवेति योग्यताविशेषणाप्रक्षेपेऽपि तुल्यम् । अतएव व्यवधायक के अभाव के तुल्य व्यवधान का अभाव भी प्रतियोगी के प्रत्यक्ष में अधिक कारण नहीं है । कारण इन्द्रियसन्निकर्ष की उत्पत्ति में ही उसका सार्थक्य है । समर्थन—अभाव के प्रत्यक्ष में आश्रय का साक्षात्कार भी कारण है । उक्त स्थल में वह नहीं है, अतः अभाव की प्रमा नहीं होती । खण्डन—यदि अभाव की प्रमा में आश्रय के साक्षात्कार को कारण मानें, तो घर से बाहर स्थित पुरुष को गृहनिष्ठ चैत्राभाव का प्रत्यक्ष नहीं होगा, कारण उसे आश्रय का साक्षात्कार नहीं है । समर्थन—व्यवधायक के होने पर भी वस्तुतः जहाँ अभाव है, वहाँ उक्त कारण होने से अभाव-प्रमा होती ही है। उसमें विरोध ही क्या है ? जहाँ व्यवहित भाव है, वहाँ प्रतियोगिविरहरूप कारण न होने से अभाव की प्रमा नहीं होगी । खंडन—तब तो प्रतियोगी के अभाव से विशिष्ट अनुपलब्भ को ही अभाव-प्रमा का कारण मानिये, 'योग्यता' के निवेश का व्यसन छोड़िये । समर्थन—यदि योग्यता का निवेश न करें, तो अन्धकार में वस्तुतः अभावयुक्त देश में भी अनुपलब्धिमात्र से अभाव का निश्चय नहीं होता; किन्तु कदाचित् सन्देह ही होता है (पिशाच के न रहते हुए भी अन्धकार में 'पिशाच रहता हुआ भी दिखायी नहीं पड़ता या वह है ही नहीं ?' ऐसा सन्देह होता ही है ), वह उपपन्न कैसे होगा ? अर्थात् यदि योग्यता पद न दें, तो ऐसे अनुपलब्भ में अतिव्याप्ति हो जायगी । खण्डन—तब तो व्यवधायक होने पर भी अभाव का सन्देह ही होता है, निश्चय नहीं । एवञ्च उक्त योग्यता का निवेश करने पर भी अतिव्याप्ति तुल्य ही है । ४०

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