खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in context१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अपि च--मेयस्य वास्तवसत्त्वं प्रमाणकोटावनिवेशार्हमेव । मेयवस्तुसत्त्व- निर्धारणार्थमेव हि प्रमाणाप्रमाणविवेचनं विचारकाणाम् । अन्यथाऽनुमाने व्याप्तावुपाधिनिरासाय आयासो व्यर्थः स्यात्, व्याप्तपक्षधर्मताज्ञानमात्रस्यैव कारणत्वाङ्गीकारेण सौष्ठव्यात् । प्राङ्नास्तिताप्रमितौ च यद्यभावप्रमाणतां मन्यसे, तर्हि सा न स्यात् । तत्रेदानों जायमानाभावप्रमोत्पत्तौ अभाववास्तवसत्ताविरहस्यापोदानीं क्वचित्स- म्भवात् । फलविषयकालिकाभावोपलक्षिताश्रयादेः कारणकोटिनिवेशने विशेषा- भावात् । तदुपलक्षितत्वस्यैव विशेषणस्य विशेषत्वेऽतिप्रसङ्गात् । तथापि सामान्यतो विशेषाभावोऽसिद्ध इति चेन्न । तस्य सत्त्वे निर्वचनापातात् । किञ्च--मेय का वास्तविक सत्त्व प्रमाण-कोटि में निवेशार्ह नहीं है। कारण मेय- रूप वस्तु के सत्त्व के निर्धारणार्थ ही विचारक लोग लक्षण से प्रमाण-अप्रमाण का विवेचन करते हैं । अन्यथा (यदि मेय के स्वरूप का प्रमाण-दल में निवेश कर सकें, तो ) अनुमानस्थल में व्याप्ति में उपाधि के निरासार्थ प्रयास व्यर्थ हो जायगा । कारण मेयविशिष्ट व्याप्तिपक्षधर्मता के ज्ञानमात्र को कारण मानने से ही निर्वाह हो सकेगा । किञ्च--यदि 'प्रतियोगी के अभाव से विशिष्ट प्रतियोगी के प्रमापक साकल्यरूप योग्यता से विशिष्ट अनुपलब्धि' को प्रमाण मानें, तो जहाँ सम्प्रति घट है, किन्तु पहले उसका अभाव था, वहाँ अतीत अभाव की 'प्रागत्र घटो नासीत्' ऐसी प्रमा नहीं होगी, कारण सम्प्रति अभावघटित उक्त प्रमाण नहीं है। यदि 'फल (प्रमा) विषय जो अतीत- काल तात्कालिक अभाव से उपलक्षित अधिकरण से विशिष्ट प्रतियोगी के प्रमापक साकल्य' को योग्यता कहें, तो उक्त स्थल में यद्यपि आपाततः दोष की प्रतीति नहीं होती, तथापि उक्त निवेश में कोई विशेष नहीं है । 'फलविषयकालिक अभावोपलक्षितत्व' को अतिप्रसङ्ग होने से विशेष कह नहीं सकते । यदि अभाव से उपलक्षित आश्रय को अभाव-प्रत्यक्ष में कारण मानें, तो सर्वत्र प्रतियोगी से युक्त अधिकरण में अभाव की प्रमा हो जायगी, कारण यदा-कदाचित् विद्यमान अभाव से उपलक्षित प्रतियोगी से युक्त अधिकरणमात्र है ही । समर्थन--यद्यपि विशेष का निर्वाचन नहीं हो सकता, तथापि प्राङ्नास्तितास्थल में अभाव की मा होती है और अन्यत्र प्रतियोगी से युक्त अधिकरण में अभाव की प्रमा नहीं होती; अतः फल के अनुरोध से विशेष की कल्पना करेंगे कि कोई विशेष है । खण्डन--यदि उक्त स्थल में विशेष है, तो अवश्य ही उसका निर्वाचन होना चाहिए । अन्यथा सर्वत्र सामान्यतः ही उत्तर होगा, विशेषतः उत्तर का सर्वत्र अभाव हो जायगा ।