BharatKosha
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

Page 380 of 610

Read in context
Page 380

३६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ प्रथम अथ यस्य विशेष इत्युक्तलक्षणवाक्ये पदसम्बन्धस्तवाभिमतः, तदा उक्तस्ताव- दोषो दोषान्तरं च स्यात्। व्याप्यभङ्गादेर्विरुद्धार्थहेत्वोः साधारणस्यासम्भवाद् विशेष- पदेनाव्यवच्छेदकेन सह विशेषणविशेष्यभावानुपपत्तेः। अथोच्यते—व्याप्तिपक्षधर्मताभङ्गाभङ्गरूपप्रकृतहेत्वपेक्षविशेषवत्तया अनुद्भाव्य- मानेन बोधितो यदीयसाध्यस्य विपर्ययः स प्रकृतः सत्प्रतिपक्ष इति। तदपि नोपपन्नम् ; यदि परः 'त्वदीयोऽयं प्रतिहेतुरित्थं भग्नव्याप्तिकः' इत्येवाभिधत्ते, न तु 'मद्धेतुतोऽयं विशेषः' इत्यपि ब्रूते, आभासान्तरत्वव्युत्पादनादेव प्रतिहेतोः सत्प्रतिपक्ष- तामङ्गात्, तदापीत्थं सत्प्रतिपक्षता न निवर्तेत । तथा सति च प्रतीयमानासिद्ध्या- दिनाऽपि सत्प्रतिपक्षीकरणमिति साधु व्युत्पादितं सर्वानुमानानुक्लं स्यात् । किञ्च—कस्मिन् काले तथाऽनुद्भाव्यमानत्वमपेक्षितम् ? यदि यदा प्रतिहेतू- द्भावनेन परहेतुं दूषयति प्रतिवादी तस्मिन् कालेऽनुद्भावनम्; तदा पश्चादुक्तेऽपि और यदि 'यस्य विशेषः' ( यत्सम्बन्धी विशेष ) ऐसा उक्त लक्षण-वाक्य में पद- सम्बन्ध हो, तो भी प्रथम पक्ष में उक्त दोष तो है ही, अन्य भी दोष है। देखिये— व्याप्ति आदि के भङ्गादि ( विरुद्ध अर्थ के साधक दो हेतुओं में ) कहीं साधारण तो मिलेंगे ही नहीं। फिर विशेष पद अव्यवच्छेदक है, अतः भङ्गाभङ्ग के साथ विशेष पदार्थ विशेषणभाव से सम्बद्ध नहीं होगा । समर्थन—'व्याप्तिपक्षधर्मता-भङ्गाभङ्ग जो प्रकृत हेत्वपेक्ष विशेष है, तादृशविशेषवत्त्व रूप से अनुद्भाव्यमान जो प्रतिहेतु, उससे बोधित है साध्यविपर्यय जिस हेतुका, वह सत्प्रतिपक्ष है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—यह भी लक्षण युक्त नहीं, कारण यदि प्रतिपक्षी कहे कि 'तुम्हारा हेतु इस प्रकार व्याप्तिरहित है' और 'मेरे हेतु से यह विशेष है' ऐसा न कहें—क्योंकि व्याप्तिभङ्ग कहने से ही प्रतिहेतु में सत्प्रतिपक्षत्व का भंग हो जाता है— तो वहाँ सत्प्रतिपक्षत्व नहीं है। पर उक्त लक्षण चला जाता है, अतः उक्त लक्षण की वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी। ऐसा मान लेने पर जिस हेतु में असिद्धादि प्रतीयमान भी हैं, उस हेतु से भी सत्प्रतिपक्षत्व हो सकेगा । अतः आपने बहुत सुन्दर कहा, आपका कथन अनुमितिमात्र के अनुकूल हुआ ! किञ्च—जिस काल में प्रतिहेतु का उद्भावन कर वादी परहेतु को दूषित करता है, यदि उस काल में विशेषवत्त्वरूप से उद्भावन अभिप्रेत है, तो जहाँ उस काल में प्रतिहेतु के दोष का उद्भावन नहीं है, किन्तु पश्चात् है, वहाँ भी पूर्वकालिक अनुद्भावन के वारण का कोई प्रतीकार नहीं है। अतः लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । इसी