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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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परिच्छेद ] सत्प्रतिपक्ष-लक्षण का खण्डन ३६३ प्रतिहेतुदोषे पूर्वकालिका‌नुद्भावने प्रतीकारो न कश्चिदिति सर्वहेत्वाभासैः सत्प्रति- पक्षीकरणमदुष्टमिति गतमनुमानकथया । अथ प्रतिवादिनाऽभिहिते यदा पुनर्वादिवचनावसरस्तदाऽनुद्भावनमिष्टम्, तर्हि तत्कथमग्रे प्रत्यनुमानवादिनाऽवधारणीयमयमत्र विशेषतो दोषं नोद्भावयि- ष्यतीति । दोषशून्यत्वात् स्वकीयस्य प्रतिहेतोः समर्थस्तदवधारयितुं शक्नोतीति चेन्न । उक्तमत्र प्रतीतदोषेणाऽपि सत्प्रतिपक्षताकरणं सम्भवति, तत्र परेण दोषेऽनुद्भाविते विजयश्च भवतीति । किञ्च—विशेषदोषशून्यत्वमपि स्वकीयहेतोः कथमयमवधारयेत् ? विरुद्धार्थ- योस्तावद्द्वयोरेकस्यावश्यं दोषेण भाव्यम् । तत्र यथा तेन स्वहेतौ दोषो न दृश्यते तथा परहेतावपि । तद्दर्शने तमेवोद्भावयेत् । को हि सचेता निश्चितं दोषमुपेक्ष्य सदोषस्य निर्दोषसामान्येन प्रत्यवतिष्ठते । तस्मात् सदोषेऽपि दोषमपश्यन्नयं न स्वेनादर्शनं दोषाभावे प्रमाणयितुमर्हतीति । प्रकार स्फुट ज्ञात सभी हेत्वाभासों से सत्प्रतिपक्षत्व होने पर तो अनुमान की कथा ही नष्ट हो जायगी, अर्थात् सद्हेतु में भी व्यक्त हेत्वाभास से युक्त प्रतिहेतु से सत्प्रतिपक्ष दे सकते हैं । यदि कहें कि प्रतिवादी के कथन के बाद फिर जब वादी के वचन का अवसर हो, उस काल में उद्भावन अभिप्रेत है, तो आप यह बतायें कि पूर्वकाल में प्रतिवादी यह कैसे जानेगा कि यहाँ वादी दोष का उद्भावन नहीं करेगा ? 'अपने हेतु में दोष न होने से वादी इसमें दोषोद्भावन नहीं करेगा, यह निश्चय हो सकता है' यह कथन युक्त नहीं, कारण हम कह आये हैं कि सदोष हेतु से भी सत्प्रतिपक्षीकरण हो सकता है और पर यदि दोष का उद्भावन न करे, तो विजय भी होती है । किञ्च—विशेष दोष से शून्यत्व का भी अवधारण हेतु में कैसे करेगा, विरुद्धार्थ हेतुओं के बीच एक में दोष अवश्य है और प्रतिवादी जैसे अपने हेतु में दोष नहीं देखता, वैसे ही परहेतु में भी नहीं देखता । यदि वह परहेतु में भी दोष देखता, तो उसीका उद्भावन करता । कौन बुद्धिमान् पुरुष निश्चित दोष को छोड़कर निर्दोष के साम्य से सदोष का खण्डन करेगा ? तस्मात् सदोष में भी दोष को न देखता हुआ वह स्व के अदर्शन ( अनुपलब्धि ) को दोषाभाव में प्रमाण नहीं कर सकता ।