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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages

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Page 475

परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५५ यस्यां दिशि क्रियया पृथ्‍वी सन्निहिता भवति, सा दिगध इति चेन्न । कूपादौ मध्यगतस्य तिर्यग्दोलायमानस्य क्रिया पतनं स्यात्, तद्गत्याक्रान्ता च तिर्यग्- दिगधः स्यात् । पृथिवीमवधीकृत्य यं चान्यं पदार्थमवधीकृत्य यो मध्य इति देशो व्यवहि- यते, स पृथिव्यतिरिक्ततदवध्यपेक्षयाऽध इति चेन्न। पृथिव्यामेव तद्व्यवहारापत्तेः। पृथिवीं पदार्थान्तरञ्चापेक्ष्य मध्यत्वस्य विवक्षितस्याधःशब्दार्थप्रदर्शनमन्त- रेण निर्वक्तुमशक्यत्वात् । पृथिव्यपेक्षयोर्ध्वं परापेक्षया चाधः, तत्र तयोर्मध्य- मित्येवं निरुच्यते मध्यत्वम्; अन्यथा तिर्यगपि प्रसङ्गात् । तथथा—पृथिव्यपेक्षया पूर्वमपरापेक्षया च पश्चिमं तयोर्मध्यमुच्यते, प्रतीपदिगवस्थितयोः परस्परापेक्षया प्रतीपदिक्सङ्करे मध्यव्यवहारात् । समर्थन—'जिस दिशा में क्रिया से पृथ्वी सन्निहित हो, वह दिशा अधःशब्दार्थ है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—कूपादि के मध्यगत टेढ़े दोलायमान जो घण्टादि हैं, उनकी क्रिया भी पतन हो जायगी और उस क्रिया से सन्निहित तिर्यग् अधः हो जायगा । समर्थन—'पृथ्वी को अवधि कर तथा अन्य पदार्थ को अवधि कर जो मध्य प्रदेश कहा जाता है, वह देश पृथ्वी से इतर अवधि की अपेक्षा अधःशब्द का अर्थ है।' खण्डन—पृथ्वी में मध्य-व्यवहार नहीं होगा, कारण पृथ्वी और इतर अवधि की अपेक्षा पृथ्वी मध्यदेश नहीं है । अतः पृथ्वी उस अवधि की अपेक्षा अधः नहीं कहलायेगी । किञ्च—पृथ्वी और पदार्थन्तर की अपेक्षा विवक्षित मध्यत्व का लक्षण अधःशब्द के निर्वचन के बिना हो नहीं सकता । 'पृथ्वी की अपेक्षा ऊर्ध्व और अन्य अवधि से अधः दोनों की अपेक्षा मध्य है' यही मध्यत्व का लक्षण कहना होगा । एवञ्च मध्य से अधः का और अधः से मध्य का लक्षण होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । यदि अधः- शब्द से घटित विवक्षित मध्य का लक्षण न करें, तो तिर्यग् देश भी मध्य कहा जाने लगेगा । देखिये—ऊर्ध्व पृथ्वी देश की अपेक्षा पूर्व और इतर अवधि की अपेक्षा पश्चिम उन दोनों की अपेक्षा मध्य है, कारण विरुद्ध दो दिशाओं में स्थित दो पदार्थों के परस्पर की अपेक्षा विरुद्ध दिशाओं का सङ्कर (पूर्व-पश्चिमरूप) ही मध्य है। यदि इसीको विवक्षित मध्य कहें, तो इतर अवधि की अपेक्षा तिर्यग्-देशरूप जो मध्य- देश है, वह भी अधः कहा जाने लगेगा । एवञ्च अधस्त्व का निरूपण न हो सकने से 'अधःस्थितत्वे सति संयोगित्व'रूप आधारत्व का लक्षण नहीं बन सकता ।