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खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

by महाकवि श्रीहर्ष

DevanagariHindipublished610 pages
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परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५५ यस्यां दिशि क्रियया पृथ्‍वी सन्निहिता भवति, सा दिगध इति चेन्न । कूपादौ मध्यगतस्य तिर्यग्दोलायमानस्य क्रिया पतनं स्यात्, तद्गत्याक्रान्ता च तिर्यग्- दिगधः स्यात् । पृथिवीमवधीकृत्य यं चान्यं पदार्थमवधीकृत्य यो मध्य इति देशो व्यवहि- यते, स पृथिव्यतिरिक्ततदवध्यपेक्षयाऽध इति चेन्न। पृथिव्यामेव तद्व्यवहारापत्तेः। पृथिवीं पदार्थान्तरञ्चापेक्ष्य मध्यत्वस्य विवक्षितस्याधःशब्दार्थप्रदर्शनमन्त- रेण निर्वक्तुमशक्यत्वात् । पृथिव्यपेक्षयोर्ध्वं परापेक्षया चाधः, तत्र तयोर्मध्य- मित्येवं निरुच्यते मध्यत्वम्; अन्यथा तिर्यगपि प्रसङ्गात् । तथथा—पृथिव्यपेक्षया पूर्वमपरापेक्षया च पश्चिमं तयोर्मध्यमुच्यते, प्रतीपदिगवस्थितयोः परस्परापेक्षया प्रतीपदिक्सङ्करे मध्यव्यवहारात् । समर्थन—'जिस दिशा में क्रिया से पृथ्वी सन्निहित हो, वह दिशा अधःशब्दार्थ है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—कूपादि के मध्यगत टेढ़े दोलायमान जो घण्टादि हैं, उनकी क्रिया भी पतन हो जायगी और उस क्रिया से सन्निहित तिर्यग् अधः हो जायगा । समर्थन—'पृथ्वी को अवधि कर तथा अन्य पदार्थ को अवधि कर जो मध्य प्रदेश कहा जाता है, वह देश पृथ्वी से इतर अवधि की अपेक्षा अधःशब्द का अर्थ है।' खण्डन—पृथ्वी में मध्य-व्यवहार नहीं होगा, कारण पृथ्वी और इतर अवधि की अपेक्षा पृथ्वी मध्यदेश नहीं है । अतः पृथ्वी उस अवधि की अपेक्षा अधः नहीं कहलायेगी । किञ्च—पृथ्वी और पदार्थन्तर की अपेक्षा विवक्षित मध्यत्व का लक्षण अधःशब्द के निर्वचन के बिना हो नहीं सकता । 'पृथ्वी की अपेक्षा ऊर्ध्व और अन्य अवधि से अधः दोनों की अपेक्षा मध्य है' यही मध्यत्व का लक्षण कहना होगा । एवञ्च मध्य से अधः का और अधः से मध्य का लक्षण होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । यदि अधः- शब्द से घटित विवक्षित मध्य का लक्षण न करें, तो तिर्यग् देश भी मध्य कहा जाने लगेगा । देखिये—ऊर्ध्व पृथ्वी देश की अपेक्षा पूर्व और इतर अवधि की अपेक्षा पश्चिम उन दोनों की अपेक्षा मध्य है, कारण विरुद्ध दो दिशाओं में स्थित दो पदार्थों के परस्पर की अपेक्षा विरुद्ध दिशाओं का सङ्कर (पूर्व-पश्चिमरूप) ही मध्य है। यदि इसीको विवक्षित मध्य कहें, तो इतर अवधि की अपेक्षा तिर्यग्-देशरूप जो मध्य- देश है, वह भी अधः कहा जाने लगेगा । एवञ्च अधस्त्व का निरूपण न हो सकने से 'अधःस्थितत्वे सति संयोगित्व'रूप आधारत्व का लक्षण नहीं बन सकता ।

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४५६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ अथान्यः कश्चिदाधारार्थोऽस्तु प्रतीतिसिद्धत्वात्, प्रतीतेश्चैवमनन्योपपाद्यत्वात् । मैवम्; तदनित्यं वा स्यात् नित्यं वा ? नाद्यः; तदभावे आधारप्रतीत्यभाव- प्रसङ्गात्, गोत्वादिनित्यत्वन्यायसाम्येऽपि अस्यानित्यत्वे तेषामप्यनित्यत्वापाताच्च । नापि द्वितीयः; तादृशमप्यनुगतमननुगतं वा स्यात् ? द्वितीये अनुगताधारप्रतीत्य- सम्भवः, सङ्केतग्रहाशक्यत्वञ्च । प्रथमे सामान्यवदाश्रयापरित्यागि वा स्यात् तत्त्यागि वा ? आद्ये यदेव तदाधारतया प्रतीत तत्दाधेयं न स्यात् । द्वितीयेऽपि च यदि नियामक मन्तरेण तत्स्वाश्रयं भजति त्यजति च, तदा नियमानुपपत्त्या सर्वदा तद्भजनत्यजनोचितप्रत्ययव्यवहारप्रसङ्गः । अथ तस्याऽऽश्रयभजनत्यजनयोर्नियामकोऽस्ति; तर्हि स वक्तव्यः । सोऽपि समर्थन—सर्वानुभव सिद्ध 'इह' इत्याकारक प्रतीति आधार की कल्पना के बिना अनुपपन्न होगी । अतः उक्त प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति से ही आधार की कल्पना करेंगे । वह आधार किम्-रूप है, इसके निर्णय से हमें कुछ प्रयोजन नहीं। खंडन— उस आधारत्व को अनित्य मानेंगे या नित्य ? प्रथम कल्प युक्त नहीं; कारण यदि अनित्य मानें, तो कदाचित् उसका अभाव भी अवश्य मानना पड़ेगा । एवञ्च आधारत्व के अभाव-काल में आधार की प्रतीति नहीं होगी । किन्तु आधार की प्रतीति सर्वदा होती है। किञ्च—गोत्वादि जाति के नित्यत्व की साधक युक्तियों ( अनुगतप्रतीतिविषयत्व, अनौपाधिकत्व या सर्वदा प्रतीयमानत्वरूप ) की तरह यहाँ भी तुल्य युक्ति होने पर भी यदि आधारत्व को अनित्य मानें, तो गोत्वादि जातियाँ भी अनित्य हो जायँगी । द्वितीय कल्प में भी आधारत्व अनुगत है या अननुगत है ? यदि अननुगत है, तो आधारमात्र में अनुगत एक धर्म न होने से अनुगत आधार की प्रतीति नहीं होगी । सिवा संकेत ( शब्दार्थ-सम्बन्ध ) का ज्ञान भी नहीं होगा । यदि अनुगत मानें, तो वह ( आधारत्व ) सामान्य की तरह आश्रय का अपरित्यागी है या परित्यागी ? आद्य पक्ष में जो जिस काल में आधारत्वरूप से प्रतीत होता है, वही उसी काल में आधेयत्वरूप से प्रतीत नहीं होगा । द्वितीय पक्ष में यदि नियामक के बिना ही वह आधारत्व आधार को त्यागता और ग्रहण भी करता है, तो सर्वदा प्राप्ति-त्याग के उचित प्रतीति या व्यवहार होना चाहिए । अर्थात् सर्वदा 'आधारः, न आधारः' दोनों व्यवहार या प्रतीतियाँ होने लगेंगी । समर्थन—उस आधारत्व के आश्रय के प्राप्ति-त्याग में नियामक है। खण्डन—तो उन नियामक को कहिये । यदि कहें कि आधारत्व की प्रतीति की अन्यथानुपपत्ति से

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परिच्छेद ] आधार-लक्षण का खण्डन ४५७ कल्पयिष्यते, अन्यथा आधारप्रतीत्यनुपपत्तिरिति चेन्न । तत्परिकल्पने यदेव भजने नियामकं स एवाऽऽधारार्थोऽस्तु, कृतं पूर्वपरिकल्पितेनेति । अस्त्वेवमेवेति चेन्न । तस्यापि स्वाश्रयभजनत्यजननियामकस्यावश्य- वाच्यत्वे तस्यापि चैवं वैयर्थ्यमित्यधिकापरिकल्पने नियमानुपपत्तिः । अधिक- परिकल्पने च पूर्वपूर्ववैयर्थ्यप्रसङ्ग इति दुरुत्तरं व्यसनमापद्येत । परस्परेण परस्परस्य नियामकत्वमिति चेत्; अन्योन्याश्रयिणावर्थावपि परस्पराकर्षकभावव्यवस्थया सुस्थीकुरु, ततो दास्यामस्त्वोत्तरम् । जात्यादयोऽपि तर्ह्येवमनुपपन्ना इति चेत् । न उच्चैर्वक्तव्यं यदि कोऽपि शृणोति, तदा महदनिष्टमस्माकं प्रकाशीकृतं स्यात् । उस नियामक की कल्पना करेंगे, तो जो प्राप्ति-त्याग में नियामक है, वही आधारत्व रहे । पूर्वकल्पित आधारत्व व्यर्थ है । यदि कहें कि ऐसा ही रहे, तो उसके भी आश्रय के प्राप्ति-त्याग में नियामक अवश्य वक्तव्य होने पर पूर्वोक्त प्रकार से पूर्व नियामक व्यर्थ है। इस प्रकार अधिका- धिक नियामक की कल्पना न करें, तो नियम नहीं होगा । यदि करे; तो पूर्व-पूर्व नियामक व्यर्थ हो जायगा । इस प्रकार अनिवार्य दुःख-परम्परा प्राप्त हो जायगी । समर्थन — पूर्व नियामक से उत्तर का और उत्तर नियामक से पूर्व का नियमन होगा । अतः न तो अनियमन है और न उत्तरोत्तर से पूर्व-पूर्व का वैयर्थ्य । खंडन — जब उत्तर स्वयं पूर्व से नियमित हो ले, तब पूर्व का नियम करेगा और पूर्व भी उत्तर से स्वयम् नियमित हो ले, तो उत्तर का नियमन करेगा, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । पहले आप इस अन्योन्याश्रय का निवारणकर आधारत्व को सुस्थिर करें, फिर हम आपको उत्तर देंगे । समर्थन — तब तो जाति आदि के भी आश्रयों के प्राप्ति-त्याग में किसी नियामक की कल्पना करनी होगी, फलतः उक्त प्रकार से जाति आदि भी व्यर्थ हो जायेंगे । यदि नियामक की कल्पना न करें, तो उस व्यक्ति से अन्यत्र भी उस जाति का व्यवहार होने लगेगा । खंडन — जोर से (उच्च स्वर से) न कहिये । यदि कोई अन्य मतवाला यह सुन लेगा, तो हम वैदिकों का महान् उपहास होगा । अर्थात् पदार्थमात्र के अनिर्वचनीयत्व- वादी हमारे मत में जाति का खण्डन भी इष्ट ही है। अतः इसी युक्ति से जाति का भी खण्डन समझ लें । ५८

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४५८ आधार-लक्षण का खण्डन [ चतुर्थ किञ्च—यत्तदाधारत्वं तत् साधारमनाधारं वा ? अन्त्ये क्व स्वविशिष्ट- प्रत्ययं कुर्यात्, विशेषाभावात् । आद्ये तदाधारत्वं वाच्यम् । स्वरूपमेव तादृशं तस्य, येन स्वयं सत्ता स्वात्मनि सत्ताप्रत्ययकारिणी सत्तान्तरमन्तरेण यथा तथेदमपि विनैव आधारान्तरमाधारप्रत्ययकारीति चेन्न । भ्रान्तित्वप्रसङ्गात् । यथा विना रजतत्वं तत्प्रत्ययो भ्रान्तिस्तथैव स्यात् । उपपाद्य- श्चायमर्थो भेदखण्डनप्रस्ताव इत्युपरम्यते । विनाऽप्याधाराधेयभावं स्वभावसम्बन्धेन नियामकत्वं भविष्यति, यथा विषयविषयिभावेनार्थज्ञानयोरिति चेन्न । स्वभावसम्बन्धस्य निरस्तत्वात् । विषय-विषयिभाव-लक्षणखण्डनम् यमुदाहरसि च विषयविषयिभावं सोऽपि वक्तुं न शक्यते । तथाहि—कः पुनर्ज्ञानादेर्घटादिना विषयविषयिभावः ? किञ्च—जो वह आधारत्व है, वह साधार है अथवा आधाररहित ? यदि उसे आधाररहित मान, तो आधारत्व की प्रतीति कहाँ होगी; कारण आधारत्व विशिष्टरूप- विशेष नहीं है । यदि आधारत्व का भी आधार मानें, तो आधारत्वरूप जो आधेय है, उसके आधारत्व का निर्वचन करना चाहिए । अर्थात् आधारत्व का आधारत्व, उसका आधारत्व, इस तरह अनवस्था होने से आधारत्व को साधार भी नहीं मान सकते । समर्थन—आधारत्व का स्वरूप ही ऐसा है कि जैसे सत्ता अन्य सत्ता के बिना ही स्व में सत्ता-प्रतीति का कारण है, वैसे ही आधारत्व भी अन्य आधारत्व के बिना ही स्व में आधारत्व-व्यवहार का कारण होगा । खण्डन—तब तो आधार-प्रतीति भ्रान्ति हो जायगी । अर्थात् जैसे बिना रजतत्व के रजत का ज्ञान भ्रम है, वैसे ही आधारत्व के बिना आधार का ज्ञान भ्रम होगा । इसका उपपादन हम भेद-खण्डन के प्रसंग में करेंगे । समर्थन—आधारत्व के साथ आधाराधेयभाव न होने पर भी स्वरूप पर- सम्बन्ध से वह नियामक होगा, जैसे कि अर्थ ज्ञान का विषय विषयिभाव से नियमन करता है । खण्डन—स्वरूपसम्बन्ध का खण्डन हो ही चुका है । विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन फिर, जिस विषय-विषयिभाव का कथन करते हैं, उसका भी उपपादन आप नहीं

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परिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४५६ प्रकाशस्य सतस्तदीयतामात्ररूपः स्वभावविशेष इति चेन्न । इच्छादिविषया- व्यापनात् । विषयिण इति चेन्न । तत्त्वस्यैव निरूप्यमाणत्वात् । किञ्च स्वभावः स्वधर्मो वा स्वात्मा वा तस्य विवक्षितः ? आद्ये ज्ञानत्वादिकं वा साधारणमसौ, तत्तद्धटज्ञाननियतो वा कश्चित् ? आद्ये साधारणान्न विशेषतस्त- दीयतामात्ररूपत्वसम्भवः । द्वितीये तु प्रतिविषयं व्यावृत्तज्ञानधर्मस्वीकारे वचन- भङ्गिभेदेन साकारवादस्वीकारः । किञ्च¹—नाऽसौ धर्म उपधेयान्तराधीनः, विषयभूतघटाद्यतिरिक्तोपाधिप्रतीत्य- पेक्षाप्रसङ्गात् । कर सकते । कहिये, ज्ञानादि का घटादि के साथ विषय-विषयिभाव क्या वस्तु है ? अर्थात् लक्षण न होने से अनिर्वचनीय है । निर्वचन—'विद्यमान प्रकाश ( ज्ञान ) का केवल तदीयतारूप ( घटादिमात्र- सम्बन्धितारूप ) स्वभाव-विशेष विषय-विषयिभाव है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—इच्छा, कृति तो प्रकाशरूप नहीं हैं, अतः उनके साथ विषय के सम्बन्ध में अव्याप्ति हो जायगी । 'प्रकाश' के स्थान पर 'विषयी' का निवेश भी नहीं कर सकते; कारण विषय-विषयि- भाव का ही यह लक्षण होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च—'स्व' शब्द आत्मा और आत्मीय का वाचक होने से यहाँ 'स्वभाव'पद से उसका धर्म विवक्षित है या आत्मा ? प्रथम पक्ष में वह ज्ञानत्व आदि साधारण धर्म है या घटादि-ज्ञानादिमें ही वृत्ति कोई धर्मविशेष ( घट-ज्ञानत्व, पटज्ञानत्व आदि ) है ? प्रथम पक्ष में ज्ञानत्वरूप विषयविषयिभाव सर्वसाधारण होने से 'यह घटविषयक ज्ञान है, यह पट-विषयक ज्ञान है' ऐसा विशेषरूप से नियम नहीं होगा । द्वितीय पक्ष अर्थात् विषय-विषय की प्रतीति से व्यावृत्त भिन्न-भिन्न ज्ञानों में वृत्ति ज्ञानधर्मरूप मानें, तो वचन-रचना के भेद से साकारवाद का स्वीकार हो जायगा । अर्थात् घटादि बाह्य पदार्थ भी ज्ञान के धर्म में प्रविष्ट होने से 'ज्ञेयाकारं ज्ञानम्' इस योगाचार-मत का अंगीकार हो जायगा । फलतः बाह्य पदार्थों का अपलाप हो जायगा । किञ्च—वह धर्म जातिरूप है या उपाधिरूप ? उपाधिरूप में भी उपाधि का निमित्त अन्य है या घटादि ही ? यदि अन्य निमित्त मानें, तो 'अयं घटः' इस ज्ञान को अपने विषयभूत घटादि से इतर की अपेक्षा हो जायगी, किन्तु वह होती नहीं है । १. यदि कहें कि ज्ञानगत असाधारण धर्म को ही बाह्यार्थ का निमित्त मानेंगे । एवञ्च विज्ञानवादमें प्रवेश नहीं होगा, तो दूसरा दोष देते हैं—'किञ्च' से ।

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४६० सानुवादखण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ न च घटादिरेव तथा; असम्बन्धात् । तथापि तथात्वे चातिप्रसङ्गात् । नापि जातिरूपः; कचिद्घटमात्रपटमात्रज्ञानगततया पृथग्व्यवस्थितौ सत्यां घटपटविषयैकज्ञाने सहावस्थित्या जातिसङ्करप्रसङ्गात् । प्रतिविषयं ज्ञानभेदनियमे विशिष्टज्ञानानुपपत्तेः, एवम्भूतविचित्रजात्यभ्यु- पगमे प्रत्येकोचितव्यवहारस्या-प्यभावप्रसङ्गात् । अथ जातिसङ्करोऽपीष्यते; तथापि स एव विशेषो घटज्ञानत्वादिरस्त्विति विषयासिद्धिः । अथ विषयेणापि सम्बन्धप्रतिभासनात् सोऽपीष्यते । न; तस्यैव सम्बन्धस्य विचार्यमाणत्वात् । 'घटज्ञानत्वादिरूप उपाधि में घटादि निमित्त हैं', ऐसा नहीं कह सकते, कारण घटादि से कोई सम्बन्ध नहीं है । यदि सम्बन्ध के बिना भी घटादि को निमित्त मानें, तो पटादि-ज्ञानत्व में भी घट निमित्त हो जायगा । घटादिज्ञानत्वादि जातिरूप भी नहीं हैं। कारण घटविषयक ज्ञान में घटज्ञानत्व और पटविषयक ज्ञान में पटज्ञानत्व और उभयविषयक समूहालम्बन ज्ञान में घटज्ञानत्व, पटज्ञानत्व दोनों के होने से साङ्कर्य हो जायगा । समर्थन—प्रतिविषय ज्ञान-व्यक्ति भिन्न-भिन्न होने से समूहालम्बन ज्ञान होता ही नहीं, तो फिर संकर कहाँ होगा ? खण्डन—यह भी युक्त नहीं, कारण ऐसा मानने पर विशिष्ट ज्ञान भी नहीं होगा। यदि कहें कि जैसे रूपत्वव्याप्य चित्रत्वजाति है, वैसे ही घटपट-समूहालम्बन-ज्ञान में घटपटज्ञानत्व से विलक्षण एक जाति मानेंगे। अतः समूहालम्बन में दोनों का समावेश न होने से सङ्कर नहीं है, तो वह भी ठीक नहीं। कारण कोई भी ज्ञान केवल एकविषयक नहीं होता। निर्विकल्पक भी अनेकविषयक होता है । एवञ्च घटज्ञानत्व, पटज्ञानत्वरूप एक-एक विषयक व्यवहार का लोप हो जायगा । समर्थन—गुण की जाति में सङ्कर-दोष नहीं होता, अतः घटज्ञानत्व पटज्ञानत्व, दोनों जातियाँ समूहालम्बन ज्ञान में रहती ही हैं । खंडन—यदि विषय-भेद से ज्ञान में जातिभेद मान लें, तो उन्हीं जातियों से प्रतीतियों में वैलक्षण्य सिद्ध ही है । फिर घटादि विषयों की असिद्धि हो जायगी । समर्थन—घट-ज्ञानत्वादि को विषय का ही तो सम्बन्ध मानते हैं, अतः सम्बन्ध की अन्यथानुपपत्ति से विषय की सिद्धि होगी ही । खण्डन—विषय तथा ज्ञान के उसी

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परिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४६१ स एवासाविति चेन्न । तदैक्यात् ज्ञानार्थसाधारणविषयप्रतीत्या- पत्तेः संयोगप्रतिपत्तिवत् । विषयित्वं तत्र, अर्थे तु विषयत्वमन्यदिति चेन्न । सैव हि ज्ञातता स्यात्, सा च निराकरिष्यते । द्वितीये च स्वात्मा घटपटव्यक्तीनामिव घटपटज्ञानव्यक्तीनां व्यावृत्त इति तत्तद्विषयविषयितागोचरानुगतबुद्धिव्यवहारभङ्गप्रसङ्गः । किञ्च—तदीयता ज्ञानस्य स्वभाव इति वचनं विचारमर्हति । तदिति तावद्विषय- परामर्शः, सम्बन्धितया छप्रत्ययस्यार्थः । तदेतद्न्योन्यविशिष्टमुभयं ज्ञानस्य स्वभाव इति ब्रुवाणेन विषयो विज्ञानस्य स्वभाव इत्युक्तं भवतीति साधु विज्ञानवादिनिरा- करणप्रकरणोपसंहारमकारि । सम्बन्ध का विचार कर रहे हैं कि वह सम्बन्ध किंरूप है ? अर्थात् उस सम्बन्ध को यदि घटज्ञानत्वादिरूप मानें, तो उसीसे प्रतीति का वैलक्षण्य की सिद्ध हो जाने से विषय की असिद्धि हो जायगी । अतः घटज्ञानत्वादिरूप वह सम्बन्ध नहीं है । समर्थन—घट तथा ज्ञान का विषयविषयिभाव ही सम्बन्ध रहे, तो हानि क्या है ? खण्डन—विषय-विषयिभावरूप सम्बन्ध एक है, अतः संयोग-प्रतिपत्ति के तुल्य ज्ञान और विषय दोनों परस्पर विषयी और विषय हो जायेंगे । समर्थन—अनुभव के अनुसार ज्ञान में विषयित्व और अर्थ में विषयत्व अन्य ही है । खंडन—अर्थगत जो अनुगत विषयत्व है, वही मीमांसकों की 'ज्ञातता' है । उसका आगे ही निराकरण करेंगे । द्वितीय पक्ष मानें, अर्थात् 'स्वमेव भावः स्वभावः' इस व्युत्पत्ति से 'स्वभाव' पद का स्वात्मा अर्थ कहें, तो घट-पट-व्यक्तियों के तुल्य घटज्ञान, पटज्ञान व्यक्तियों के भी होने त भिन्न-भिन्न संपूर्ण घटज्ञांन में एकाकार अनुगत प्रतीति नहीं होगी । किञ्च—'तदीयता ज्ञान का स्वभाव है' यह कथन भी विचारणीय है । यहाँ तद्- शब्द से विषय का परामर्श है और सम्बन्धिता ( सम्बन्ध ) छप्रत्यय का अर्थ है । 'ये दोनों परस्पर मिलकर अर्थात् विषय-सम्बन्ध ज्ञान के स्वभाव हैं' यह जो कहते हैं, उससे 'विषय विज्ञान का स्वभाव है' यह भी उक्त हो जाता है । एवञ्च इस तरह विज्ञानवाद का समर्थन हो जाने से [ 'आत्म-तत्त्व-विवेक' में किये गये ] विज्ञान- वाद के खण्डन-प्रकरण का आपने खूब ही उपसंहार किया !

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४६२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ

सम्बन्धमात्रं ज्ञानस्य स्वभावः, न तु विषय इत्याशय इति चेन्न । विशेषा- नुपादाने सम्बन्धमात्रमिदं सर्वस्यैव स्यात् । यतो न तावन्न कस्यचित्, सम्बन्धस्वरूपतात्यागप्रसङ्गात् । नापि नियतस्य; तादात्म्यापत्तेरुक्तत्वात्, नियामकासम्भवाच्च । कारणं नियामकमिति चेत्, तेन नियामकेन किं भवति ? तदीयत्वं तस्य सम्बन्धस्येति चेत्; तदेव तदीयत्वं ज्ञानस्वभावभूतसम्बन्धस्वरूपप्रविष्टमुत बहिर्भूतं धर्मान्तरम् ? यदि प्रथमः ; तच्छब्दार्थोऽपि तर्हि स्वरूपप्रविष्ट इति विषयज्ञानयोः स एवाभेदप्रसङ्गः । द्वितीये च तस्य धर्मान्तरस्य विषयेणाभेदः, तच्छब्दार्थस्य विषयस्य विशेषणस्य तदीयशब्दार्थे विशिष्टरूपे प्रविष्टस्य स्वीकृतधर्मान्तर- स्वभावतया निरुक्तत्वात् । समर्थन—'तदीय' यहाँ छप्रत्यय से प्रतीयमान सम्बन्धमात्र ही ज्ञान का स्वभाव है, विषय नहीं। एवञ्च विज्ञानवाद का प्रसंग नहीं आयेगा। खंडन—विशेष विषय का उपादान न करें तो सम्बन्धमात्र सभी ज्ञानों में सभी वस्तुओं का रहेगा, कारण 'सम्बन्ध किसी का नहीं है' ऐसा नहीं है। एवञ्च सभी ज्ञानों का अभेद हो जायगा । यह भी नहीं कह सकते कि सम्बन्ध किसी की भी अपेक्षा न कर स्वतन्त्र ही रहेगा; कारण यदि सम्बन्ध को सम्बन्धी से अनियत मानें, तो वह अपने स्वरूप से ही उच्छिन्न हो जायगा, अर्थात् सम्बन्ध ही नहीं कहलायेगा। समर्थन—घटादि से नियत सम्बन्ध ही ज्ञान का स्वभाव है। खण्डन—तब तो ज्ञान के स्वरूप में घट का भी प्रवेश हो जाने से घट और ज्ञान, दोनों का अभेद हो जायगा । किञ्च—'घट का सम्बन्ध घटज्ञान का स्वभाव है' इसमें कोई नियामक भी नहीं है। समर्थन—घट और चक्षुस्सम्बन्धजन्यत्व को ही नियामक मानेंगे। खण्डन—घट, और चक्षुस्सम्बन्धजन्यत्वरूप नियामक क्या करता है ? यदि कहें कि वह ज्ञान के स्वभाव- भूत सम्बन्ध में घटीयत्व को उत्पन्न करता है, तो यह विकल्प होता है कि वह घटीयत्व ज्ञान के स्वभावभूत सम्बन्ध के स्वरूप में अन्तर्भूत है या उससे बहिर्भूत धर्मान्तर है ? यदि प्रथम कल्प मानें, तो तद्शब्दार्थ का भी स्वरूप में प्रवेश होने से वही विषय और ज्ञान के अभेद का प्रसङ्ग हो जायगा। यदि द्वितीय कल्प मानें, तो तदीयस्वरूप उस धर्मान्तर का विषय के साथ अभेद हो जायगा। कारण तदीयशब्द का अर्थ विशिष्ट में प्रविष्ट तथा विशेषण तत्-शब्द के अर्थ विषय का स्वीकृत तदीयत्वरूप धर्मान्तर के स्वरूप में अन्तर्भाव है।

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परिच्छेद ] विषय-विषयिभाव लक्षण का खण्डन ४६३ अस्तु असौ धर्मो विषयाभिन्न इति चेत् ; तथापि किमसौ स्वीकृतेन स्वभाव- सम्बन्धेन सम्बद्धो न वा ? न चेत्, तद्विज्ञानं न कस्यचित्सम्बन्धि स्यात् । सम्बद्धश्चेत्, किं सम्बन्धान्तरेण आहो स्वभावसम्बन्धेनैवासौ ज्ञानात्मकसम्बन्ध- सम्बन्धीयः ? आद्ये तत्राप्येवं प्रसङ्गः, यस्या भयेन स्वभावसम्बन्धः स्वीकृतः, सा तदवस्थै- वानवस्था । द्वितीयश्चेत्, ज्ञानात्मकसम्बन्धसम्बन्धीय इत्यत्र विशिष्टस्वरूपे ज्ञान- रूपमपि विशेषणं प्रविष्टमिति पूर्वोक्तन्यायेन अधुनोक्तन्यायेन च ज्ञानस्यैकस्यैव द्वयमपि स्वात्मेति वाग्भङ्गिभेदमात्रेण ज्ञानगोचरयोरभेदस्वीकार इति । एतेनान्यत्रापि स्वभावसम्बन्धः प्रत्याख्यातव्यः । ज्ञानीयफलाधारत्वं विषयत्वम्, तद्वत्त्वं च विषयित्वमित्यपि दुष्टम् । तथाहि—ज्ञानीयं फलं ज्ञातता वा व्यवहारो वा स्यात् ? आद्ये अतीतानागतधीभ्रमाद्यर्थाव्याप्तिः । न च तत्रैव फलजनने किं समर्थन—वह तदीयत्व विषय से अभिन्न ही रहे, तो हानि ही क्या है ? खण्डन—वह तदीयत्व ज्ञान के स्वभाव-सम्बन्ध से संबद्ध है या नहीं ? संबद्ध नहीं है, तो विज्ञान किसीका सम्बन्धी न कहलायेगा । यदि सम्बद्ध है, तो क्या अन्य सम्बन्ध से या स्वरूप सम्बन्ध से ? यदि प्रथम कल्प मानें, तो वह सम्बन्ध भी अन्य सम्बन्ध से ही विज्ञान के स्वभावभूत सम्बन्ध का सम्बन्धी होगा । इस प्रकार उत्तरोत्तर सम्बन्ध का स्वीकार होने से वही अनवस्था हो जायगी, जिसके भय से आप स्वरूप सम्बन्ध का स्वीकार करते हैं । यदि स्वभाव सम्बन्ध से सम्बन्धी है, तो तदीयत्व का ज्ञानात्मक स्वभाव सम्बन्ध के स्वरूपरूप सम्बन्धी में ज्ञान-विशेषण भी प्रविष्ट है, इस पूर्वोक्त रीति से तथा सम्प्रति उक्त रीति से ज्ञान के ही घट और घटीयत्व दोनों आत्मा हुए । अतः वचन-रचना के भेद से ज्ञान और विषय का अभेद ही सिद्ध हुआ । इसी प्रकार अन्यत्र याने समवाय, अभाव आदि स्थलों में भी स्वरूप-सम्बन्ध का खण्डन जानना चाहिए । समर्थन—'ज्ञान का जो फल, उसका आधारत्व विषयत्व है और उस फल का जनकत्व विषयित्व है', ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—यह भी लक्षण दोषयुक्त है, कारण ज्ञानजन्य फल ज्ञातता है या व्यवहार ? प्रथम पक्ष में अतीत-अनागतविषयक बुद्धिस्थल में तथा भ्रमविषय में अव्याप्ति

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४६४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ नियामकमिति प्रयोजकमनुगतं शक्यनिर्वचनम्, तथात्वे वा तदेव विषयत्वमस्तु । व्यवहारश्च यदि कराकर्षणादिः, स न सार्वत्रिकः नान्तरीयकश्वान्यत्रापि इत्यतिव्यापकम् । यदि इच्छादिः, तदाधारत्वमात्मन इति घटाद्यव्याप्तिः । तद्विष- यत्वं च तद्विषयत्वमेवापेक्षते । यश्चोपेक्षां नाम व्यवहारं नानुमनुते, कथं नोपेक्षाप्रेक्षामुपेक्षते । हानादि- व्यवहारज्ञानानामेव च कथं न निर्विषयत्वं प्रसज्यते । अथ सर्वत्र हानादि- व्यवहारोपगमः, तदा व्यवहारज्ञानयोरनुपरम एव स्यात् । हो जायगी । कारण उक्त स्थल में उत्पन्न विषय के वर्तमान न होने से बिना आधार के ज्ञातता कहाँ उत्पन्न होगी । किञ्च—घट-ज्ञानसे घट में ही ज्ञातता होती है, पट में नहीं, इसमें अनुगत प्रयोजक का निर्वचन संभव नहीं है। यदि कोई अनुगत प्रयोजक हो भी, तो उसीको विषयत्व मान लीजिये, उससे पृथक् ज्ञातता मानना व्यर्थ है । द्वितीय पक्ष में व्यवहार को हस्त आदि से आनयनादि रूप मानें, तो वह सर्वत्र गुणादि या व्यापक आत्मादि में नहीं है, उसमें विषयत्व के लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—मणि-आनयनरूप व्यवहार उसकी प्रभा में भी है और केवल मणिविषयक ज्ञान की विषय प्रभा है नहीं, अतः प्रभा में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । व्यवहार से यदि इच्छा का ग्रहण करें, तो उसका आधार आत्मा है, घटादि नहीं। अतः घटादि में अव्याप्ति हो जायगी । यदि ज्ञानजन्य जो इच्छा, तद्विषयत्व को व्यवहार कहें, तो विषयत्व-लक्षण विषयत्व से घटित होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च—इच्छाविषयत्व भी ज्ञान-विषयत्व की अपेक्षा करता है। अतः जबतक ज्ञानविषयत्व का ज्ञान न हो, तबतक इच्छा-विषयत्व का ज्ञान भी असंभव है। किञ्च—जो उपेक्षा (औदासीन्य) को व्यवहार नहीं मानते, उनके मत में ‘ग्रामं गच्छन् तृणं स्पृशति' इस ज्ञान के विषय तृणस्पर्श में लक्षण की अव्याप्ति हो जायगी । यदि हान-उपादानरूप ज्ञान-फल के आधारत्व को ही विषयत्व कहें, तो हान-उपादान के ज्ञान का हान-उपादान विषय नहीं हो सकेगा । कारण जैसे घटादिज्ञान से ज्ञान-उपादान विषय नहीं हो सकेगा। कारण जैसे घटादिज्ञान से ज्ञान उपादान होता है, वैसे ही हान-उपादानज्ञान से हान-उपादान नहीं होता । यदि हानादि-ज्ञान से हानादि- व्यवहार मान लें, तो उस हानादि-व्यवहार से भी हानादि-व्यवहार मानने में अनवस्था हो जायगी। किञ्च—हानादि-ज्ञान से हानादि-व्यवहार का असम्भव भी है ।

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परिच्छेद ] विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४६५ एतेन तत्सम्बन्धत्वं यदुच्यते यत्प्रतिबद्धव्यवहारानुकूलस्वभावं यद्विज्ञानं तत्तस्य विषयः, तद्वत्त्वं विषयित्वमिति । तदपि प्रागुक्तयुक्तिं नातिवर्तते । { 'अथोच्यते य एवार्थो यस्यां संविदि भासते । तद्वेद्यः स पृथक् नेति वेद्यावेद्यस्य लक्षणम् ॥'—इति । तदपि न विद्मः ; यस्यां संविदीति किं संविदधिकरणम् , अथ तद्विषयः, अथ सम्बन्धमात्रम् ? नाद्यः ; घटादेस्तदधिकरणत्वानुपगमेन अव्यापनात्, यथा तथा निर्वचने ज्ञानत्वादयतिव्याप्तेश्च । द्वितीयश्च अद्याप्यनिरूपितः कथं निरूपकः स्यात्, वैपरीत्यापाताच्च । तृतीय- श्चातिव्यापकः ; कारणादेरपि तत्सम्बन्धित्वात् ज्ञानान्तरेणावभासमानत्वात् । समर्थन—'जो ज्ञान जिस वस्तु से प्रतिबद्ध (सम्बद्ध)

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४६६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ तयैव संविदा भासमानत्वमिति चेन्न । भासमानत्वस्यैव निरूप्यमाणत्वात्, तन्निरूप्यत्वात्तद्रूच्वस्य । यस्यां संविदि प्रकाशमानायां यः प्रकाशत एवेति चेन्न । प्रकाशमानताया एव निरूप्यमाणत्वात् । सामान्यतो विषयत्वे सिद्धे विशेषतो विषयत्वाभिधानमिति चेन्न । सर्वथा विशेषानुपपत्तिद्वारा सामान्यानुपपत्तौ तद्विषयप्रमात्वस्यापि सन्दिग्धत्वात् । ज्ञानाकारार्पणक्षमो हेतुरेव विषय इति चेन्न । आकार एव केनार्पित इति से संविद् ही विषय और घटादि ही विषयी क्यों न कहे जाएँ ? तृतीय पक्ष में संविद् के कारण चक्षु आदि भी संविद् के सम्बन्धी हैं तथा वे अन्य ज्ञान से प्रकाशित भी होते हैं; अतः उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'जो जिस संविद् के सम्बन्धी हों तथा उसी संविद् से भासमान हों, वे उस संविद् के विषय हैं' ऐसा कहेंगे । ज्ञान के कारण चक्षुरादि ज्ञानसंबंधी और भास- मान होने पर भी उसी ज्ञान से भासमान नहीं होते, अतः उनमें अतिव्याप्ति नहीं होगी। खण्डन—भासमानत्व विषयत्व का लक्षण है ही। यदि उसमें भी भासमानत्व का प्रवेश करें, तो आत्माश्रय हो जायगा । समर्थन—'जिस¹ संविद् के प्रकाशित होने पर जो वस्तु प्रकाशित हो, वह उस संविद् की विषय है', ऐसा लक्षण करेंगे। खण्डन—प्रकाशविषयता ही प्रकाशमानता है। एवञ्च विषयत्व का अद्यापि निरूपण न होने से प्रकाशमानता ही असिद्ध हैं, अर्थात् आत्माश्रय है । समर्थन—सामान्यरूप से विषयत्व तो सिद्ध ही है। यह लक्षण विशेषरूप से विषयत्व के ज्ञान के लिए है, अतः आत्माश्रय नहीं होगा। खंडन—सामान्य निर्विशेष नहीं होता । एवञ्च एक भी विशेष का ज्ञान न होने से सामान्य के सत्त्व में संदेह होगा, जिससे सामान्यविषयक ज्ञान का प्रमात्व भी सन्दिग्ध ही है । समर्थन—'ज्ञान² में घटाद्याकारों का जो अर्पण है, उसका हेतु विषय है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—ज्ञान में आकार किसके द्वारा अर्पित होता है, इसका ज्ञान ही अशक्य १. 'विषयनिरूप्यं हि ज्ञानम्, अतो ज्ञानवित्तिवेद्यो विषयः' इस नियम के अनुसार कहा गया है । २. यह बाह्यार्थवादी बौद्ध का लक्षण है ।

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परिच्छेद ] विषय विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४६७ विनिगन्तुमशक्यत्वात् । न ह्याकारस्ततो ज्ञानस्वरूपादन्यः, तत्र च तथोत्पन्नानि कारणानि प्रत्येकमेव समर्थानीति कथं तेषु विशेषं विनिगमयिष्यसि । यद्यपि सकलसमर्थहेत्वनुविधानमस्ति, तथापि स्फुटं तावद्घटस्यानुविधान- मिति तदेव तदाकारप्रयोजकमित्यत इति चेन्न । समस्तकारणान्तरानुविधानव- द्घटानुविधानस्य प्रामाणिकत्वाविशेषेण किं स्फुटत्वास्फुटत्वाभ्यां स्यात् । स्फुटा- नुविधानमादायैव विषयनिरुक्तिं कुर्म इति चेन्न । सर्वहेत्वनुविधानस्य न्यायतः स्फुटत्वात् । दृश्यमानमनुविधानं यस्येति चेन्न । दत्तोत्तरत्वात् । दृश्यमानतैव च विष- यताऽनिर्वचनान्न शक्योपदर्शना । ज्ञानकर्मत्वमित्यपि न ; ज्ञानेन कर्मणः सम्बन्धस्य निर्वक्तव्यत्वात् । तन्निरुक्तिभङ्गश्च ईश्वराभिसन्धौ ज्ञाततावादे द्रष्टव्यः । है, अर्थात् उसमें कोई विनिगमक नहीं है ; कारण आकार विज्ञान से भिन्न नहीं है, किन्तु विज्ञानरूप ही है । अतः मिलित कारण ही ज्ञान के आकार के हेतु हैं । फिर उन हेतुओं में अमुक आकार का हेतु है, इस विशेष का निश्चय कैसे करेंगे ? समर्थन—यद्यपि ज्ञान के आकार में सभी हेतुओं का अन्वय है, तथापि घट का अन्वय स्फुट है । अतः घट ही आकार का प्रयोजक है । एवञ्च ‘स्फुटानुविधानत्वे सति आकारसमर्पको हेतुः’ ऐसा लक्षण कर ही सकते हैं । खण्डन—यदि सम्पूर्ण कारणों का आकार में अन्वय प्रमाण से सिद्ध है, तो ‘अमुक कारण का अन्वय स्फुट है और अमुक का नहीं है’ इस कथन से क्या लाभ है ? यदि कहें कि ‘स्फुट अभिधान’ इस कथन का यही प्रयोजन है कि स्फुट लक्षण होता है, तो सभी कारणों का अन्वय एक-सा है; अतः युक्ति से सभीका अन्वय स्फुट ही है । समर्थन—‘जिसका अन्वय ज्ञान के आकार में प्रत्यक्ष है, वह विषय है’ ऐसा कहेंगे । खण्डन—जब सभी कारण हैं, तो सबका अन्वय प्रत्यक्ष ही है । किञ्च— प्रत्यक्षता भी विषयता ही है, अतः आत्माश्रय हो जायगा । समर्थन—‘ज्ञान का कर्म विषय है’ ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन—ज्ञान के साथ कर्म का क्या सम्बन्ध है, यह कहना होगा । किन्तु उसका निर्वाचन नहीं कर सकते, यह बात ‘ईश्वराभिसन्धि’ नामक ग्रन्थ के ज्ञाततावाद में स्पष्ट है, वहीं देख लेना चाहिए ! [अर्थात् ज्ञान और कर्म का सम्बन्ध संयोग नहीं हो सकता,

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विना सम्बन्धान्तरं यद्विशेषणं ज्ञानं स विषयः। तेन विना सम्बन्धान्तरं ज्ञानविशेष्यं विषयः। विशेष्यं चेदं यद्विशिष्टनामकं तत्त्वान्तरं यद्गतं धर्मं गृह्णातीति। अत्रोच्यते ; यद्गतं धर्मं गृह्णातीत्येतावन्मात्रमेव विवक्षितं गृह्णातीत्येवेति वा ? आद्ये दण्डस्यापि विशेष्यत्वापातः , तद्गतस्यापि सत्त्वादेर्धर्मस्य ग्रहणात्। नापरः ; भवति हि व्यभिचारिणो धूमस्याविच्छिन्नमूलकत्वादि विशेषणं तद्वि- शिष्टं च तत्त्वान्तरम्। न च विशेष्यस्य धर्मं व्यभिचारितां गृह्णाति। अथोर्ध्वाविरतगतिविशिष्टस्याविच्छिन्नमूलता विशेषणम्। न च तथाभूतस्य व्यभिचारिता धर्म इत्युच्यते। मैवम् ; प्रथमविशिष्टः किं व्यभिचारी न वा ? क्योंकि ज्ञान द्रव्य नहीं है। समवाय भी नहीं, ज्ञान आत्मा का गुण होने से वह समवायेन घट में नहीं रह सकता। परस्पर विरुद्ध होने से दोनों के तादात्म्य सम्बन्धकी बात तो दूर ही रही। फलतः दोनों का सम्बन्ध क्रिया-कर्मभाव ही कहना होगा। किन्तु वह भी नहीं हो सकता । परसमवेत-क्रियाफलशालित्वरूप कर्मत्व का स्वप्रकाशवाद में खण्डन किया गया है। फिर, फलत्व भी क्या है ? ज्ञातता या व्यवहार तो नहीं कह सकते, क्योंकि अभी-अभी उनका खण्डन कर ही चुके हैं। यदि विषयत्व कर्मत्व कहें, तो आत्माश्रय हो जायगा, इत्यादि दूषण इस लक्षण में जानने चाहिए।] समर्थन — 'अन्य सम्बन्ध के बिना ज्ञान जिसका विशेषण हो। वह विषय है।' फलित यह हुआ कि अन्य सम्बन्ध के बिना ज्ञान का जो विशेष्य हो, वह विषय है। विशिष्ट नामक पदार्थान्तर जिसके धर्म का ग्रहण करे, वह विशेष्य है। 'ज्ञातो घटः' यहाँ ज्ञान बिना किसी अन्य सम्बन्ध के घट में विशेषण है, अतः घट विशेष्य है। खण्डन — जिसके धर्म का ग्रहण करे इसका क्या अर्थ है — जिसके यत्किंचित् धर्म का ग्रहण करे, यह अर्थ है ? या जिसके सम्पूर्ण धर्मों का ग्रहण करे यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष मानें तो 'दण्डी पुरुषः' यहाँ दण्ड भी विशेष्य हो जायगा; कारण विशिष्ट दण्ड में स्थित सत्त्वादि धर्म का ग्रहण करता ही है। द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, कारण वह्नि के व्यभिचारी धूम से अविच्छिन्नमूलत्वविशिष्ट धूम अन्य है और वह धूम के धर्म व्यभिचारित्व का ग्रहण नहीं करता। अतः धूम में अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन — अविच्छिन्नमूलत्व ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम का ही विशेषण है एवञ्च उक्त विशेषणविशिष्ट धूम का व्यभिचारित्व धर्म नहीं है, अतः धूम में अव्याप्ति नहीं होगी। खण्डन — ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्टरूप विशेषणसे विशिष्ट धूम व्यभिचारी है या नहीं ?

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परिच्छेद ] विषय-विषयी-भाव-लक्षण का खण्डन ४६६ आद्ये स एव दोषः; द्वितीये विशेषणान्तरान्तर्भाववैयर्थ्यम्, प्रथमविशिष्ट एव च तद्दोषावसरः । अथ यद्धर्मविशिष्टस्य तद्विशेषणं तद्धर्मं गृह्णाति, न सर्वम् । न च व्यभिचा- रिताविशिष्टस्य तानि विशेषणानीति चेन्न । तत्किं धूममात्रं न व्यभिचारि ? ततश्च व्यभिचारिताविशिष्टस्यैव तस्य तानि तथा । भवतु व्यभिचारिता तद्विशे- षणम्, परं सा न विशेष्यकोटिरिति चेन्न । अद्यापि विशेष्याज्ञानात् । किञ्च—तद्विशेषणमिति तत्सम्बन्धिमात्रं वा विशेषणतया वा सम्बन्धि ? आद्येऽतिप्रसङ्गः । द्वितीये तु तथैवान्योन्याश्रयादि । आद्य पक्ष में ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम के व्यभिचारित्व रूप धर्म को अविच्छिन्नमूलत्व- विशिष्ट ग्रहण नहीं करता। अतः अव्याप्ति तदवस्थ ही है। द्वितीय पक्ष में विशेषण व्यर्थ है। यदि उक्त विशेषण नहीं दें, तो ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम व्यभिचारितारूप धर्म का ग्रहण नहीं करता, अतः धूम में अव्याप्ति पूर्ववत् स्थित है। समर्थन—'जिस धर्म से विशिष्ट विशेष्य का विशेषण हो, तद्धर्मरूप जिसके धर्म का विशिष्ट ग्रहण करे, सब धर्मों का नहीं, वह विशेष्य है'। व्यभिचारिताविशिष्ट धूम का अविच्छिन्नमूलत्व विशेषण नहीं है, अतः वहाँ अव्याप्ति नहीं है। खंडन—तब क्या धूममात्र व्यभिचारी नहीं है ? यदि है, तो व्यभिचारिताविशिष्ट ही अविच्छिन्न- मूलत्व धूम में विशेषण है, अतः पूर्ववत् अव्याप्ति है। समर्थन—'जो धर्म विशेष्यता का अवच्छेदक हो, तद्धर्मरूप जिसके तद्धर्म का विशिष्ट नामक तत्त्वान्तर ग्रहण करे, वह विशेष्य है।' खंडन—विशेष्य का ही यह लक्षण है, अतः अभीतक उसका ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा। किंच—'तद्विशेषण' शब्द का क्या अर्थ है, 'जिसका सम्बन्धी हो' यह अर्थ है या 'जिसका विशेषणतारूप से सम्बन्धी हो' यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में उपलक्षण (उपरञ्जक) के भी सम्बन्धी होने से वह भी विशेषण हो जायगा। द्वितीय पक्ष में विषयत्व की निरुक्ति में विशेषणत्व का और विशेषणत्व की निरुक्ति में विषयत्व का प्रवेश होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा। कारण ज्ञान की प्रकारतारूप विषयता ही विशेषणता है।

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४७० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ किञ्च विशेष्यत्वलक्षणो यस्तद्गतो धर्मस्तं गृह्णाति न वा ? आद्येऽतिव्याप्तिः, द्वितीये गृह्णात्येवेति नियमोऽसिद्धः । किञ्च—'मत्समवायो ज्ञानस्ये'त्यत्र भवति मत्समवायस्य ज्ञानं विशेषणं सम्बन्धान्तरमन्तरेणैव, न च विषयः । न च गुणगुण्यादिविशेष्यभावे यः सम्बन्धान्तरमन्तरेणेत्युक्त्या व्यव- च्छेद्यतां नीतः, स एवार्यं समवाय इति कथं न व्यवच्छेद्यतां प्रतिपत्स्यते ? यतोऽत्र तस्यैव विशेषणविशेष्यभावत्वादन्तरत्वासिद्धिरिति । तस्मात् सम्बन्धान्तरेण ज्ञानं विशेषणं यस्येत्युक्तम्, तत्र ज्ञानं सम्बन्ध- मनपेक्ष्य स्वभावत एव यथाऽर्थस्य विशेषणं तथा समवायस्यापीति न कश्चि- द्विशेष इति साधूक्तं 'मत्समवायो ज्ञानस्ये'त्यत्र ज्ञानविषयता समवायस्य स्यादिति । ज्ञानाभावे च प्रसङ्गात् । किंच—विशिष्ट विशेष्य धूमगत विशेष्यत्वरूप धर्म का ग्रहण करता है या नहीं ? यदि ग्रहण करता है, तो अविशेष्य में भी विशिष्ट में विशेष्यत्व हो जायगा । यदि ग्रहण नहीं करता, तो सब धर्मों का ग्रहण न होने से धूम में भी असम्भव हो जायगा । किंच—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ समवाय में ज्ञान अन्य सम्बन्ध के बिना ही विशेषण होता है, पर वह ( समवाय ) ज्ञान का विषय नहीं है । समर्थम—समवायसम्बन्ध से ज्ञान आत्मा का विशेषण है, अतः ज्ञान को विषयत्व न हो, इसलिए सम्बन्धान्तर पद समवाय के व्यवच्छेद के लिए है । फिर उससे 'मत्सम- वायो ज्ञानस्य' यहाँ भी समवाय का व्यवच्छेद क्यों न हो ? खण्डन — सम्बन्धान्तर पद का अर्थ अन्य सम्बन्ध है । यहाँ अन्य से विशेष्यविशेषणभाव से अन्य का ग्रहण करते हैं और समवाय विशेष्य से अन्य नहीं है । अतः अन्य शब्द से समवाय का व्यवच्छेद नहीं होगा । तस्मात् 'ज्ञान अन्य सम्बन्ध के बिना जिसका विशेषण हो, वह विषय है' इस लक्षण का जैसे ज्ञान सम्बन्ध के बिना ही स्वरूप सम्बन्ध से अर्थ का विशेषण है, वैसे ही 'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ समवाय का भी विशेषण होगा । दोनों स्थलों में कोई विशेष नहीं है । अतः उक्त स्थल में समवाय के विषय होने से अतिव्याप्ति हो जायगी, यह ठीक ही कहा है । इतना ही नहीं, इस लक्षण की अतिव्याप्ति भी है । अर्थात् 'ज्ञानाभावोऽस्ति' यहाँ अभाव में ज्ञान स्वरूप से ही विशेषण होता है, अतः अभाव भी विषय हो जायगा ।

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परिच्छेद ] विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४७१ न च तत्र स एव समवायः सम्बन्धः ; अत्रापि विशेषणविशेष्यभावस्यैव सम्बन्धत्वात् । नासौ सम्बन्धिनोऽन्यः, तादृशश्च व्यवच्छेद्य इति चेन्न । समवायेऽपि तुल्यत्वात् । संयोगसमवायौ व्यवच्छिद्येते इति चेन्न । ज्ञानाभावे तथापि प्रसङ्गात् । न तत्र ज्ञानं विशेषणम्, किन्तु उपलक्षणमिति चेन्न । अतीतानागतयो- रविषयत्वापत्तेः । समर्थन—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ स्वरूप सम्बन्ध से ही समवाय में ज्ञान विशेषण है और वह स्वरूप समवायरूप ही है। एवञ्च सम्बन्धान्तर (समवाय) से ही विशेषण है, उसके बिना नहीं; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो सर्वत्र असम्भव हो जायगा; कारण 'ज्ञातो घटः' इत्यादि स्थल में भी विशेषण- विशेष्यभावरूप सम्बन्धान्तर से ही ज्ञान घट में विशेषण होता है । समर्थन—सम्बन्धान्तर पद से सम्बन्धी से अन्य सम्बन्ध का ग्रहण होता है । विशेषणविशेष्यभाव सम्बन्धी से अन्य नहीं है, अतः सर्वत्र असम्भव नहीं होगा । खण्डन—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ भी समवाय सम्बन्धी ही है और वही उक्त स्थल में स्वरूप है । अतः सम्बन्धान्तर के बिना ही ज्ञान के समवाय में विशेषण होने से अतिव्याप्ति युक्त ही है । समर्थन—सम्बन्धान्तर पद से संयोग और समवाय का व्यवच्छेद विवक्षित है । 'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ स्वरूप समवायरूप है, अतः उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—ऐसा मानने पर भी 'ज्ञानाभावः' यहाँ भी ज्ञान का विषय अभाव हो जायगा, कारण यहाँ सम्बन्धान्तर (समवाय) के बिना ही ज्ञान अभाव का विशेषण होता है । समर्थन—ज्ञान अभाव में विशेषण नहीं, किन्तु उपलक्षण है । अतः विशेषण- घटित उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—अतीतविषयक, ('अभूद्वृष्टिः' ) और अनागतविषयक ('भविष्यति वृष्टिः' ) ज्ञानस्थल में वृष्टि ज्ञान की विषय न कहलायेगी, कारण वर्तमान वस्तुओं में ही विशेषण-विशेष्यभाव होता है । अतीत विषय वर्तमान ज्ञान का विशेष्य नहीं हो सकता ।

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४७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ भावे चिन्तेयमिति चेन्न । अभावस्याविषयत्वापातात् । ज्ञानादन्यत् ज्ञानीयञ्च यत्कारणादि तत्रापि प्रसङ्गादिति किं विस्तरेण । न च ज्ञानाकारतायां गोचरस्य नास्त्येव ज्ञानगोचरयोर्भेदः ; प्रतीतिविरोधात् । भेदमनिच्छता च स प्रतिषेद्धुमप्यनर्ह इति । भेद‌लक्षण-खण्डनम् 'वक्तव्यस्तर्हि कोऽसौ भेदो नाम ? स हि स्वरूपं वा स्यात् , इतरेतराभावो यदि 'बिना सम्बन्धान्तर के ज्ञान का भावरूप जो विशेष्य है, वह विषय है' ऐसा लक्षण करें, तो 'घटो नास्ति' इस ज्ञान का अभाव विषय नहीं कहलायेगा । किंच— ज्ञान से भिन्न जो ज्ञान के सम्बन्धी कारणादि हैं, उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । कारण 'ज्ञानस्य कारणम्' इत्यादि स्थल में भी सम्बन्धान्तर के बिना ही कारणादि ज्ञान के विशेष्य होते हैं । विज्ञों के लिए विषयविषयिभाव का खण्डन इतना ही बहुत है, विस्तार व्यर्थ है । समर्थन —विषय ज्ञान का स्वरूप ही है, अतः ज्ञान और विषय में परस्पर भेद नहीं है । एवञ्च ज्ञानाभिन्नत्व ही ज्ञान-विषयत्व है । खण्डन—ज्ञान और विषय में अभेद अनुभव से विरुद्ध है, भेद ही अनुभव से सिद्ध है । किंच—यदि भेद न हो, तो 'ज्ञानगोचरयोर्नास्ति भेदः' इस प्रकार भेद का खण्डन भी नहीं हो सकेगा, कारण जो एकदेश या एक काल में रहता है, उसीका निषेध अन्य देश या अन्य काल में होता है । सर्वथा असत् शशशृङ्ग का निषेध नहीं होता । भेद-लक्षण का खण्डन किंच-- भेद क्या वस्तु है, यह भी कहिये ! क्या स्वरूप ही भेद है या अन्योन्या- भाव या वैधर्म्य ? इनमें यदि प्रथम पक्ष मानें, तो अभेद भ्रम ही नहीं होगा । कारण १. ऊपर 'भेदमनिच्छता' इत्यादि ग्रन्थ से नैयायिक मत का अनुसरणकर बौद्ध का खण्डन किया गया है कि यदि भेद प्रमित ही नहीं, तो उसका खण्डन कैसा ? इसपर बौद्ध कहेगा कि किसीकी प्रतिषेध्यता में प्रमितत्व ( सत्यत्व ) ही प्रयोजक नहीं, प्रतीतत्व मात्र से भी प्रतिषेध हो सकता है । यदि प्रतीतत्व मानें, तो फिर कहिये, वह भेद ही क्या है ? अतः खण्डनकार का यह भेद-खण्डन का पूर्वपक्ष सौगत मत के माध्यम से ही समझना चाहिए । इसी तरह यद्यपि प्रत्यक्ष-बाधोद्धार प्रकरण में एकबार भेद का निरास हो ही चुका है फिर भी 'आत्मतत्त्व-विवेक' में विशेष रूप से भेद का जो मण्डन किया गया है, उसका खण्डन करने के लिए यह ग्रन्थ है, यह भाव है ।

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परिच्छेद ] भेद लक्षण का खण्डन ४७३ वा, धर्मान्तरं वा ? नाद्यः ; भिन्नेऽभिन्नभ्रमानुपपत्तिप्रसङ्गात् । भ्रान्त्याऽपि धर्मिस्वरूपावगाहनात् । अन्यथा कस्याभेदं सा भ्रान्तिरुल्लिखेत् । ननु निःसम्बन्धित्वेन व्यवस्थितेषु तरुदारुप्रभृतिषु नानाधारोऽवयव्यन्य एवाऽऽरोप्यते, येषु त्वारोप्यते ते भेदेनैव भान्ति । किन्तु अनारब्धावयविषु तेष्वारब्धावयवितया विभ्रम्यते । मैवम्; तेषामनुदाहरणीयत्वात् । अतस्मिन् 'स एवायमि'ति प्रत्यभिज्ञाभासार्थानां दृष्टान्तत्वेनेष्टत्वात् । तत्रापि धर्मान्तरारोपाभ्युपगमे तादात्म्याभावस्य संसर्गाभावप्रवेशापत्तेः । न चैवमप्येष्टव्यमेव, तथापि स्वरूपभेदग्रहे तत्राभेदस्य धर्मस्याप्यशक्यारोपत्वात् । स्वरूप ही भेद होने से भेदग्रह उस अभेदभ्रम का विरोधी है; भ्रम भी धर्मी के स्वरूप को विषय करता ही है । यदि भ्रम धर्मी के स्वरूप को विषय न करे, तो किसमें अभेद को विषय करेगा ? समर्थन—परस्पर-सम्बन्ध-रहित ( उदासीन रूप से ) विद्यमान दूरस्थ अनेक तरु-दारु प्रभृति में एक अवयववाले का अभेद-भ्रम नहीं होता, किन्तु नाना अवयववाले अन्य अवयवी का ही आरोप होता है। जहाँ वह आरोपित होता है, वे भेदरूप में ही भासते हैं । किन्तु अनारब्ध अवयवियों में आरब्धावयवित्व का आरोप होता है । एवञ्च वह भेदग्रह का विरोधी नहीं है । खंडन—जहाँ दूरत्व दोष से अनेक वृक्षों में एकवृक्षत्व का भ्रम होता है, उस स्थल में हमने दोष नहीं दिया है । किन्तु जहाँ भिन्न में 'स एवायम्' ऐसा प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम होता है, उस उदाहरण में दोष दिया है । समर्थन—प्रत्यभिज्ञारूप भ्रम में भी तादात्म्यरूप धर्म का ही भ्रम होता है, धर्मी के अभेद का नहीं । खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो अन्योन्याभाव का संसर्गाभाव में अन्तर्भाव हो जायगा । कारण 'नायं चैत्रः' इस विशेष-दर्शन को यदि भेदविषयक मानें, तो इससे धर्मारोप की निवृत्ति नहीं होगी । अतः धर्मारोपवादी उक्त विशेष-दर्शन को निश्चय ही संसर्गाभावविषयक मानेंगे । किन्तु आप अन्योन्याभाव का अस्वीकार नहीं कर सकते, कारण उसीके निरूपण में प्रवृत्त हैं । किञ्च—स्वरूप-भेद का ग्रह होने पर तादात्म्यरूप धर्म का भी आरोप नहीं हो सकता । कारण तादात्म्य भी अभेदरूप ही है और भेदग्रह होने पर अभेद-भ्रम नहीं हो सकता । ६०

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४७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ

नापि द्वितीयः ; प्रतीतावन्योन्याश्रयप्रसङ्गात् । प्रतियोगिरूपत्वेन अप्रतीतावधिकरणप्रतीतिः, अधिकरणस्वभावत्वेनास्मृतौ प्रतियोगिस्मृतिश्च तद्ग्रहणकारणम् । अतः केतरेतराश्रय इति चेत् । मैवम् ; एवं हि सति 'कुम्भः पटो न भवती'त्यत्र यथैव तस्याभावस्य प्रतियोगितया पटो निषिद्ध्यते तथा कुम्भोऽपीति सोऽपि कुम्भात्मतया निषिद्धः प्रसज्येत । वस्तुतोऽन्योन्याभावस्य कुम्भप्रतियोगित्वेऽपि कुम्भस्यापटत्वनिरूपणकाले कुम्भस्य प्रतियोगिता नापेक्ष्यते, किन्त्वाश्रयतैवेति कुम्भाप्रतिक्षेपः । पटस्य तु प्रतियोगितैवापेक्ष्यते, न त्वाश्रयतेति कुम्भवत् पटस्यापि न सङ्ग्रहापत्तिः । यद्यप्यन्योन्याभावस्य उभयप्रतियोगिता ; तथाप्यन्या कुम्भाश्रयता, अन्या च पटाश्रयता, अन्या कुम्भप्रतियोगिता, अन्या च पटप्रतियोगिता । तेनान्यो- इतरेतराभाव या अन्योन्याभाव भेद है, यह द्वितीय पक्ष मानें तो अन्योन्याश्रय हो जायगा । कारण प्रतियोगित्वरूप से प्रतियोगी का ज्ञान अन्योन्याभाव के ज्ञान में कारण है और अभावरूपत्व ही प्रतियोगित्व है। अतः जबतक अभाव-ज्ञान न हो, तबतक अभावाभावस्वरूप प्रतियोगित्व का ज्ञान नहीं होगा । समर्थन—प्रतियोगित्वरूप से अप्रतीति के काल में अधिकरण की प्रतीति तथा अधिकरणत्वरूप से अस्मृति के काल में प्रतियोगी की स्मृति अन्योन्याभाव के ग्रह में कारण है, अतः अन्योन्याश्रय नहीं है। खण्डन—ऐसा मानने पर 'कुम्भः पटो न भवति' यहाँ जैसे उस अभाव के प्रतियोगित्वरूप से पट निषिद्ध होता है, वैसे ही कुम्भ भी निषिद्ध होता है। अतः उस काल में कुम्भत्वरूप से कुम्भ का निषेध हो जायगा । वस्तुतः अन्योन्याभाव कुम्भप्रतियोगिक होने पर भी कुम्भ में पट के निषेध- काल में कुम्भ की प्रतियोगिता अपेक्षित नहीं, किन्तु आश्रयता ही अपेक्षित है। अतः उस काल में कुम्भ का निषेध नहीं होता । इसी तरह पट की प्रतियोगिता ही अपेक्षित है, आश्रयता नहीं । अतः कुम्भ के तुल्य पट का अधिकरणरूप से संग्रह नहीं होता । समर्थन—यद्यपि अन्योन्याभाव के दोनों प्रतियोगी और दोनों अधिकरण हैं, तथापि कुम्भनिष्ठ आश्रयता अन्य है और पटनिष्ठ आश्रयता अन्य । वैसे ही कुम्भनिष्ठ प्रति- योगिता अन्य है और पटनिष्ठ प्रतियोगिता अन्य । अतः अन्योन्याभाव के उभय- प्रतियोगिक और उभयाश्रित होने पर भी सर्वत्र दोनों का निषेध या संग्रह नहीं होता ।