खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ भावे चिन्तेयमिति चेन्न । अभावस्याविषयत्वापातात् । ज्ञानादन्यत् ज्ञानीयञ्च यत्कारणादि तत्रापि प्रसङ्गादिति किं विस्तरेण । न च ज्ञानाकारतायां गोचरस्य नास्त्येव ज्ञानगोचरयोर्भेदः ; प्रतीतिविरोधात् । भेदमनिच्छता च स प्रतिषेद्धुमप्यनर्ह इति । भेदलक्षण-खण्डनम् 'वक्तव्यस्तर्हि कोऽसौ भेदो नाम ? स हि स्वरूपं वा स्यात् , इतरेतराभावो यदि 'बिना सम्बन्धान्तर के ज्ञान का भावरूप जो विशेष्य है, वह विषय है' ऐसा लक्षण करें, तो 'घटो नास्ति' इस ज्ञान का अभाव विषय नहीं कहलायेगा । किंच— ज्ञान से भिन्न जो ज्ञान के सम्बन्धी कारणादि हैं, उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । कारण 'ज्ञानस्य कारणम्' इत्यादि स्थल में भी सम्बन्धान्तर के बिना ही कारणादि ज्ञान के विशेष्य होते हैं । विज्ञों के लिए विषयविषयिभाव का खण्डन इतना ही बहुत है, विस्तार व्यर्थ है । समर्थन —विषय ज्ञान का स्वरूप ही है, अतः ज्ञान और विषय में परस्पर भेद नहीं है । एवञ्च ज्ञानाभिन्नत्व ही ज्ञान-विषयत्व है । खण्डन—ज्ञान और विषय में अभेद अनुभव से विरुद्ध है, भेद ही अनुभव से सिद्ध है । किंच—यदि भेद न हो, तो 'ज्ञानगोचरयोर्नास्ति भेदः' इस प्रकार भेद का खण्डन भी नहीं हो सकेगा, कारण जो एकदेश या एक काल में रहता है, उसीका निषेध अन्य देश या अन्य काल में होता है । सर्वथा असत् शशशृङ्ग का निषेध नहीं होता । भेद-लक्षण का खण्डन किंच-- भेद क्या वस्तु है, यह भी कहिये ! क्या स्वरूप ही भेद है या अन्योन्या- भाव या वैधर्म्य ? इनमें यदि प्रथम पक्ष मानें, तो अभेद भ्रम ही नहीं होगा । कारण १. ऊपर 'भेदमनिच्छता' इत्यादि ग्रन्थ से नैयायिक मत का अनुसरणकर बौद्ध का खण्डन किया गया है कि यदि भेद प्रमित ही नहीं, तो उसका खण्डन कैसा ? इसपर बौद्ध कहेगा कि किसीकी प्रतिषेध्यता में प्रमितत्व ( सत्यत्व ) ही प्रयोजक नहीं, प्रतीतत्व मात्र से भी प्रतिषेध हो सकता है । यदि प्रतीतत्व मानें, तो फिर कहिये, वह भेद ही क्या है ? अतः खण्डनकार का यह भेद-खण्डन का पूर्वपक्ष सौगत मत के माध्यम से ही समझना चाहिए । इसी तरह यद्यपि प्रत्यक्ष-बाधोद्धार प्रकरण में एकबार भेद का निरास हो ही चुका है फिर भी 'आत्मतत्त्व-विवेक' में विशेष रूप से भेद का जो मण्डन किया गया है, उसका खण्डन करने के लिए यह ग्रन्थ है, यह भाव है ।