खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] विषय-विषयिभाव-लक्षण का खण्डन ४७१ न च तत्र स एव समवायः सम्बन्धः ; अत्रापि विशेषणविशेष्यभावस्यैव सम्बन्धत्वात् । नासौ सम्बन्धिनोऽन्यः, तादृशश्च व्यवच्छेद्य इति चेन्न । समवायेऽपि तुल्यत्वात् । संयोगसमवायौ व्यवच्छिद्येते इति चेन्न । ज्ञानाभावे तथापि प्रसङ्गात् । न तत्र ज्ञानं विशेषणम्, किन्तु उपलक्षणमिति चेन्न । अतीतानागतयो- रविषयत्वापत्तेः । समर्थन—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ स्वरूप सम्बन्ध से ही समवाय में ज्ञान विशेषण है और वह स्वरूप समवायरूप ही है। एवञ्च सम्बन्धान्तर (समवाय) से ही विशेषण है, उसके बिना नहीं; अतः अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—यदि ऐसा मानें, तो सर्वत्र असम्भव हो जायगा; कारण 'ज्ञातो घटः' इत्यादि स्थल में भी विशेषण- विशेष्यभावरूप सम्बन्धान्तर से ही ज्ञान घट में विशेषण होता है । समर्थन—सम्बन्धान्तर पद से सम्बन्धी से अन्य सम्बन्ध का ग्रहण होता है । विशेषणविशेष्यभाव सम्बन्धी से अन्य नहीं है, अतः सर्वत्र असम्भव नहीं होगा । खण्डन—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ भी समवाय सम्बन्धी ही है और वही उक्त स्थल में स्वरूप है । अतः सम्बन्धान्तर के बिना ही ज्ञान के समवाय में विशेषण होने से अतिव्याप्ति युक्त ही है । समर्थन—सम्बन्धान्तर पद से संयोग और समवाय का व्यवच्छेद विवक्षित है । 'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ स्वरूप समवायरूप है, अतः उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन—ऐसा मानने पर भी 'ज्ञानाभावः' यहाँ भी ज्ञान का विषय अभाव हो जायगा, कारण यहाँ सम्बन्धान्तर (समवाय) के बिना ही ज्ञान अभाव का विशेषण होता है । समर्थन—ज्ञान अभाव में विशेषण नहीं, किन्तु उपलक्षण है । अतः विशेषण- घटित उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—अतीतविषयक, ('अभूद्वृष्टिः' ) और अनागतविषयक ('भविष्यति वृष्टिः' ) ज्ञानस्थल में वृष्टि ज्ञान की विषय न कहलायेगी, कारण वर्तमान वस्तुओं में ही विशेषण-विशेष्यभाव होता है । अतीत विषय वर्तमान ज्ञान का विशेष्य नहीं हो सकता ।