भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 490

४७० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ किञ्च विशेष्यत्वलक्षणो यस्तद्गतो धर्मस्तं गृह्णाति न वा ? आद्येऽतिव्याप्तिः, द्वितीये गृह्णात्येवेति नियमोऽसिद्धः । किञ्च—'मत्समवायो ज्ञानस्ये'त्यत्र भवति मत्समवायस्य ज्ञानं विशेषणं सम्बन्धान्तरमन्तरेणैव, न च विषयः । न च गुणगुण्यादिविशेष्यभावे यः सम्बन्धान्तरमन्तरेणेत्युक्त्या व्यव- च्छेद्यतां नीतः, स एवार्यं समवाय इति कथं न व्यवच्छेद्यतां प्रतिपत्स्यते ? यतोऽत्र तस्यैव विशेषणविशेष्यभावत्वादन्तरत्वासिद्धिरिति । तस्मात् सम्बन्धान्तरेण ज्ञानं विशेषणं यस्येत्युक्तम्, तत्र ज्ञानं सम्बन्ध- मनपेक्ष्य स्वभावत एव यथाऽर्थस्य विशेषणं तथा समवायस्यापीति न कश्चि- द्विशेष इति साधूक्तं 'मत्समवायो ज्ञानस्ये'त्यत्र ज्ञानविषयता समवायस्य स्यादिति । ज्ञानाभावे च प्रसङ्गात् । किंच—विशिष्ट विशेष्य धूमगत विशेष्यत्वरूप धर्म का ग्रहण करता है या नहीं ? यदि ग्रहण करता है, तो अविशेष्य में भी विशिष्ट में विशेष्यत्व हो जायगा । यदि ग्रहण नहीं करता, तो सब धर्मों का ग्रहण न होने से धूम में भी असम्भव हो जायगा । किंच—'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ समवाय में ज्ञान अन्य सम्बन्ध के बिना ही विशेषण होता है, पर वह ( समवाय ) ज्ञान का विषय नहीं है । समर्थम—समवायसम्बन्ध से ज्ञान आत्मा का विशेषण है, अतः ज्ञान को विषयत्व न हो, इसलिए सम्बन्धान्तर पद समवाय के व्यवच्छेद के लिए है । फिर उससे 'मत्सम- वायो ज्ञानस्य' यहाँ भी समवाय का व्यवच्छेद क्यों न हो ? खण्डन — सम्बन्धान्तर पद का अर्थ अन्य सम्बन्ध है । यहाँ अन्य से विशेष्यविशेषणभाव से अन्य का ग्रहण करते हैं और समवाय विशेष्य से अन्य नहीं है । अतः अन्य शब्द से समवाय का व्यवच्छेद नहीं होगा । तस्मात् 'ज्ञान अन्य सम्बन्ध के बिना जिसका विशेषण हो, वह विषय है' इस लक्षण का जैसे ज्ञान सम्बन्ध के बिना ही स्वरूप सम्बन्ध से अर्थ का विशेषण है, वैसे ही 'मत्समवायो ज्ञानस्य' यहाँ समवाय का भी विशेषण होगा । दोनों स्थलों में कोई विशेष नहीं है । अतः उक्त स्थल में समवाय के विषय होने से अतिव्याप्ति हो जायगी, यह ठीक ही कहा है । इतना ही नहीं, इस लक्षण की अतिव्याप्ति भी है । अर्थात् 'ज्ञानाभावोऽस्ति' यहाँ अभाव में ज्ञान स्वरूप से ही विशेषण होता है, अतः अभाव भी विषय हो जायगा ।