खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
by महाकवि श्रीहर्ष
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Read in contextपरिच्छेद ] विषय-विषयी-भाव-लक्षण का खण्डन ४६६ आद्ये स एव दोषः; द्वितीये विशेषणान्तरान्तर्भाववैयर्थ्यम्, प्रथमविशिष्ट एव च तद्दोषावसरः । अथ यद्धर्मविशिष्टस्य तद्विशेषणं तद्धर्मं गृह्णाति, न सर्वम् । न च व्यभिचा- रिताविशिष्टस्य तानि विशेषणानीति चेन्न । तत्किं धूममात्रं न व्यभिचारि ? ततश्च व्यभिचारिताविशिष्टस्यैव तस्य तानि तथा । भवतु व्यभिचारिता तद्विशे- षणम्, परं सा न विशेष्यकोटिरिति चेन्न । अद्यापि विशेष्याज्ञानात् । किञ्च—तद्विशेषणमिति तत्सम्बन्धिमात्रं वा विशेषणतया वा सम्बन्धि ? आद्येऽतिप्रसङ्गः । द्वितीये तु तथैवान्योन्याश्रयादि । आद्य पक्ष में ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम के व्यभिचारित्व रूप धर्म को अविच्छिन्नमूलत्व- विशिष्ट ग्रहण नहीं करता। अतः अव्याप्ति तदवस्थ ही है। द्वितीय पक्ष में विशेषण व्यर्थ है। यदि उक्त विशेषण नहीं दें, तो ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम व्यभिचारितारूप धर्म का ग्रहण नहीं करता, अतः धूम में अव्याप्ति पूर्ववत् स्थित है। समर्थन—'जिस धर्म से विशिष्ट विशेष्य का विशेषण हो, तद्धर्मरूप जिसके धर्म का विशिष्ट ग्रहण करे, सब धर्मों का नहीं, वह विशेष्य है'। व्यभिचारिताविशिष्ट धूम का अविच्छिन्नमूलत्व विशेषण नहीं है, अतः वहाँ अव्याप्ति नहीं है। खंडन—तब क्या धूममात्र व्यभिचारी नहीं है ? यदि है, तो व्यभिचारिताविशिष्ट ही अविच्छिन्न- मूलत्व धूम में विशेषण है, अतः पूर्ववत् अव्याप्ति है। समर्थन—'जो धर्म विशेष्यता का अवच्छेदक हो, तद्धर्मरूप जिसके तद्धर्म का विशिष्ट नामक तत्त्वान्तर ग्रहण करे, वह विशेष्य है।' खंडन—विशेष्य का ही यह लक्षण है, अतः अभीतक उसका ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा। किंच—'तद्विशेषण' शब्द का क्या अर्थ है, 'जिसका सम्बन्धी हो' यह अर्थ है या 'जिसका विशेषणतारूप से सम्बन्धी हो' यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष में उपलक्षण (उपरञ्जक) के भी सम्बन्धी होने से वह भी विशेषण हो जायगा। द्वितीय पक्ष में विषयत्व की निरुक्ति में विशेषणत्व का और विशेषणत्व की निरुक्ति में विषयत्व का प्रवेश होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा। कारण ज्ञान की प्रकारतारूप विषयता ही विशेषणता है।