भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 610 में से

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पृष्ठ 488

विना सम्बन्धान्तरं यद्विशेषणं ज्ञानं स विषयः। तेन विना सम्बन्धान्तरं ज्ञानविशेष्यं विषयः। विशेष्यं चेदं यद्विशिष्टनामकं तत्त्वान्तरं यद्गतं धर्मं गृह्णातीति। अत्रोच्यते ; यद्गतं धर्मं गृह्णातीत्येतावन्मात्रमेव विवक्षितं गृह्णातीत्येवेति वा ? आद्ये दण्डस्यापि विशेष्यत्वापातः , तद्गतस्यापि सत्त्वादेर्धर्मस्य ग्रहणात्। नापरः ; भवति हि व्यभिचारिणो धूमस्याविच्छिन्नमूलकत्वादि विशेषणं तद्वि- शिष्टं च तत्त्वान्तरम्। न च विशेष्यस्य धर्मं व्यभिचारितां गृह्णाति। अथोर्ध्वाविरतगतिविशिष्टस्याविच्छिन्नमूलता विशेषणम्। न च तथाभूतस्य व्यभिचारिता धर्म इत्युच्यते। मैवम् ; प्रथमविशिष्टः किं व्यभिचारी न वा ? क्योंकि ज्ञान द्रव्य नहीं है। समवाय भी नहीं, ज्ञान आत्मा का गुण होने से वह समवायेन घट में नहीं रह सकता। परस्पर विरुद्ध होने से दोनों के तादात्म्य सम्बन्धकी बात तो दूर ही रही। फलतः दोनों का सम्बन्ध क्रिया-कर्मभाव ही कहना होगा। किन्तु वह भी नहीं हो सकता । परसमवेत-क्रियाफलशालित्वरूप कर्मत्व का स्वप्रकाशवाद में खण्डन किया गया है। फिर, फलत्व भी क्या है ? ज्ञातता या व्यवहार तो नहीं कह सकते, क्योंकि अभी-अभी उनका खण्डन कर ही चुके हैं। यदि विषयत्व कर्मत्व कहें, तो आत्माश्रय हो जायगा, इत्यादि दूषण इस लक्षण में जानने चाहिए।] समर्थन — 'अन्य सम्बन्ध के बिना ज्ञान जिसका विशेषण हो। वह विषय है।' फलित यह हुआ कि अन्य सम्बन्ध के बिना ज्ञान का जो विशेष्य हो, वह विषय है। विशिष्ट नामक पदार्थान्तर जिसके धर्म का ग्रहण करे, वह विशेष्य है। 'ज्ञातो घटः' यहाँ ज्ञान बिना किसी अन्य सम्बन्ध के घट में विशेषण है, अतः घट विशेष्य है। खण्डन — जिसके धर्म का ग्रहण करे इसका क्या अर्थ है — जिसके यत्किंचित् धर्म का ग्रहण करे, यह अर्थ है ? या जिसके सम्पूर्ण धर्मों का ग्रहण करे यह अर्थ है ? प्रथम पक्ष मानें तो 'दण्डी पुरुषः' यहाँ दण्ड भी विशेष्य हो जायगा; कारण विशिष्ट दण्ड में स्थित सत्त्वादि धर्म का ग्रहण करता ही है। द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है, कारण वह्नि के व्यभिचारी धूम से अविच्छिन्नमूलत्वविशिष्ट धूम अन्य है और वह धूम के धर्म व्यभिचारित्व का ग्रहण नहीं करता। अतः धूम में अव्याप्ति हो जायगी। समर्थन — अविच्छिन्नमूलत्व ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्ट धूम का ही विशेषण है एवञ्च उक्त विशेषणविशिष्ट धूम का व्यभिचारित्व धर्म नहीं है, अतः धूम में अव्याप्ति नहीं होगी। खण्डन — ऊर्ध्वाविरतगतिविशिष्टरूप विशेषणसे विशिष्ट धूम व्यभिचारी है या नहीं ?

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