कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
by भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in contextसातवाँ उल्लास बटुक और शक्ति-पूजन देवी बोलीं—हे कुलेश ! बटुकादि को बलिप्रदान और शक्ति के लक्षणों के सम्बन्ध में अब मुझे बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो, जब तक बटुक को बलि अर्पित नहीं की जाती, तब तक किसी देवता को तृप्ति नहीं होती । अतः बटुकादि को उनके मन्त्र-विधान से गन्ध-पुष्प- आसव और आमिष प्रदान कर देवता की प्रसन्नता को प्राप्त करे । 'ॐ ॐ ॐ देवीपुत्र बटुकनाथ कपिलजटाभारभासुर पिङ्गल त्रिनेत्र ज्वालामुख इमां ०पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा'—इस मन्त्र से बटुक को बलि देकर यह प्रार्थना करे— 'बलिदानेन सन्तुष्टो वटुकः सर्वसिद्धिदः । शान्तिं करोतु मे नित्यं भूतवेतालसेवितः ।' 'ॐ ॐ ॐ सर्वयोगिनीभ्यः सर्वभूतेभ्यः सर्वभूताधिपाय डाकिनीभ्यः शाकिनीभ्यः त्रैलोक्यविपद्वासिनीभ्य इमां पूजां बलिं गृह्ण गृह्ण स्वाहा'—से योगिनियों को बलि देकर यह प्रार्थना करे— या काचित् योगिनी रौद्रा सौम्या सौम्यतरा यदि । खेचरी भूचरी व्योमचरी प्रीतास्तु मे सदा ॥ 'ॐ ॐ ॐ सर्वभूतेभ्यः सर्वभूतपतिभ्यो हुँ फट्'—से फा० ३