कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२ हिन्दी कुलार्णव और पूजन अन्य देवता का करे तो दोनों ही देवताओं का शाप साधक को प्राप्त होता है। इन सब बातों को गुरुदेव से जानकर शास्त्रीय विधि से अङ्गों और आवरणों सहित देवता की षोडशोपचारों से पूजा करे, तो वह प्रसन्न होता है। मूलमन्त्र और पादुका का जपकर अन्तःशक्ति का स्मरण कर अंगुष्ठ और अनामिका के संयुक्त नख से पात्रस्थ द्रव्य को ऊपर निकाल कर वीर साधक विधिपूर्वक तर्पण करे। अंगुष्ठ भैरव-रूप है और अनामा चण्डिकारूपा है। अनामा अंगुष्ठ के योग से वश्यकर्म में, तर्जनी-अंगुष्ठ के योग से अभिचार में और कनिष्ठांगुष्ठ से स्तम्भन में तर्पण करे। इस प्रकार पूजा-रहस्य और कुलद्रव्य का संस्कार मैंने संक्षेप में कहा। अब हे देवि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?