कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Kularnava Tantra with Hindi Commentary
by भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (origin)
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Read in context४२ हिन्दी कुलार्णव छठवें 'उन्मना' उल्लास से युक्त होने पर बारम्बार मूर्छा, गिर-गिर कर उठना आदि क्रियायें होती हैं। बाह्य दृष्टि निमेष और उन्मेष से रहित होकर लक्ष्य अन्तर्मुख हो जाता है। यही शिव की कामदायिनी शाम्भवी मुद्रा है। लोभ-रहित होकर उल्लास-युक्त होनेवाले वीर साक्षात् शिव ही हैं, इसमें संदेह नहीं। अपने अनुष्ठान में तल्लीन होकर वे और सब कुछ भूल जाते हैं। इस अवस्था में वे मन- वचन से परे परम सुख को प्राप्त करते हैं। यह सुख शर्करा और दुग्ध के स्वाद के समान स्वयं ही अनुभव द्वारा ज्ञेय है। वह सुख किस प्रकार का होता है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। पुलक आदि के द्वारा जो सुखपूर्ण अवस्था दिखाई देती है, वह 'ब्रह्मध्यान' कहलाती है। यह सुखपूर्ण अवस्था सातवें 'मनोल्लास' से युक्त महात्माओं की होती है। भैरवी चक्र में सभी वर्ण द्विजातिवत् माननीय होते हैं। जाति-भेद नहीं रहता। चक्र के समाप्त होने पर सामाजिक अनुशासन पुनः लागू हो जाता है। चक्र में चाहे स्त्रियों को अलग बैठावे या पुरुषों के साथ दम्पति के रूप में पंक्ति अथवा चक्राकार स्थान दे। शिव-शक्ति के रूप में उन सबकी चक्र में पूजा करे। जिस समय शिव-शक्ति का समायोग होता है, वही-कुल साधकों की समाधिस्था सन्ध्या है। इस प्रकार मैंने तत्त्वत्रयोल्लास और पान-भेदादि का वर्णन संक्षेप में किया। अब हे कुलेशानि ! तुम क्या सुनना चाहती हो ?