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कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

by भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished84 pages

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नवाँ उल्लास योग-योगीश-लक्षण और कौलपूजा देवीबोली — हे कुलेश ! योग-योगीश का लक्षण और कुल- भक्त की पूजा का फल बताइए । ईश्वर ने कहा—हे देवि ! ध्यान दो प्रकार का है—१ स्थूल, २ सूक्ष्म । साकार ध्यान स्थूल और निराकार ध्यान सूक्ष्म कहा जाता है। स्थूल से बुद्धि निश्चित होती है और सूक्ष्म से सुस्थिति । हाथ-पैर, पेटादि अंग और अस्थि से रहित, सर्वतेजोमय, सच्चिदानन्द परमेश्वर का ध्यान करे । न उसका उदय होता है, न अस्त । न बढ़ता है, न घटता । वह अवस्था- रहित और स्वयं-प्रकाश है। सत्तामात्र उस अदृश्य तत्त्व का वाणी द्वारा आत्मा में जो सायुज्य प्राप्त होता है, उस ज्ञान को 'ब्रह्मज्ञान' कहा जाता है। वायु-संचार को रोककर पत्थर के समान स्थिर हो परजीव के एक धाम को जाननेवाला 'योगी' कहलाता है। जिस ध्यानावस्था में पदार्थ मात्र भासित हो और रूप का अभाव हो जाय, वह 'समाधि' कही जाती है। हे देवि ! किसी भी चिन्तन से स्वयं तत्त्व का प्रकाश नहीं होता और स्वयं तत्त्व का प्रकाश होने पर साधक तत्क्षण तन्मय हो जाता है। स्वप्न-जाग्रदवस्था में जो स्वप्नवत् निश्वास- श्वासहीन रहता है वह निश्चय ही 'मुक्त' है। इन्द्रिय-समूह को निष्क्रिय रखकर आत्मा से निश्चय हो जो मृतवत् रहता है, वह साक्षात् 'जीवन्मुक्त' कहा जाता है। न सुनता है, न देखता है, न बैठता है, न जाता है, न सुख-दुःख को जानता है, न मन उनमें लिप्त होता है—इस प्रकार संसार से विरक्त हो जो